सत्ता का स्थायी पता और लापता होता विपक्ष: लोकतंत्र में विकल्पों का संकट.. क्यों भाजपा अपराजेय दिखती है?

कहते हैं राजनीति संभावनाओं का खेल है, लेकिन हालिया रिपोर्ट अगर सही मानी जाए तो भारत की राजनीति अब संभावनाओं से आगे निकलकर एक तय स्क्रिप्ट में बदलती दिख रही है। स्क्रिप्ट साफ है आने वाले 30–35 साल तक सत्ता के केंद्र में एक ही नाम गूंजेगा: भारतीय जनता पार्टी।

 

नहीं जीते, उसने राजनीति खेलने के नियम ही बदल दिए। पार्टी ने संगठन को इतना कसकर गढ़ा कि अब यहां विचारधारा से ज्यादा जीतने की क्षमता मायने रखती है। भाजपा में हार कोई अनुभव नहीं, बल्कि राजनीतिक डेथ सर्टिफिकेट बन चुकी है। एक नेता हारा नहीं कि दूसरा तैयार खड़ा है बिना विद्रोह, बिना ड्रामा के।

 

नरेंद्र मोदी के बाद क्या? यही सवाल विपक्ष पूछता रहा और भाजपा ने जवाब संगठन से दे दिया। रिपोर्ट साफ कहती है कि भाजपा अब व्यक्ति-आधारित नहीं, सिस्टम-आधारित पार्टी बन चुकी है। नेतृत्व बदलेगा, चेहरा बदलेगा, लेकिन सत्ता का चरित्र नहीं बदलेगा।

 

हां, जनता कभी-कभी ऊब जाती है। बदलाव का रोमांस भारतीय राजनीति में भी है। रिपोर्ट मानती है कि संभव है किसी चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो जाए, लेकिन यह राजनीतिक ब्रेक होगा, ब्रेकअप नहीं। विपक्ष अगर किसी तरह पांच साल सरकार चला भी ले, तो भाजपा अगली बार पूरी ताकत के साथ लौटेगी, और फिर लंबी पारी खेलेगी।

 

सबसे बड़ा सवाल.. विकल्प कौन?

रिपोर्ट का जवाब निर्मम है: कोई नहीं।

 

क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में राजा हैं, लेकिन दिल्ली की गद्दी तक पहुंचने की उनकी औकात वहीं खत्म हो जाती है। आम आदमी पार्टी को कभी अपवाद माना गया था, लेकिन अब वह भी राष्ट्रीय राजनीति की फुटनोट बनती दिख रही है। अधिकतम पंजाब, वह भी स्थायी गारंटी के बिना।

और कांग्रेस?

 

यही वह पार्टी है जो भाजपा को टक्कर दे सकती थी अगर चाहती, अगर कर पाती। लेकिन कांग्रेस आज एक ऐसे राजनीतिक विरोधाभास में फंसी है, जहां गांधी परिवार के साथ रहे तो धीरे-धीरे खत्म होती है, और अगर उससे छुटकारा पाती है तो एक झटके में बिखर जाती है। नेतृत्व भी समस्या है और नेतृत्व का अभाव भी।

 

रिपोर्ट का सबसे कड़वा सच यही है, जब तक कांग्रेस जीवित है, भाजपा का कोई विकल्प पैदा नहीं होगा।

और जब तक विकल्प पैदा नहीं होता, भाजपा निर्विवाद रूप से नंबर वन बनी रहेगी।

 

भारतीय राजनीति आज उस मुकाम पर खड़ी है जहां मुकाबला भाजपा बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि भाजपा बनाम समय का है। सवाल सिर्फ इतना है, क्या वक्त कभी पलटेगा, या इतिहास अब एक ही पार्टी के नाम से लिखा जाएगा?

 

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