Home समाज तीन पीढ़ियां बड़ी हो गईं, विधायक आज भी गोपाल भार्गव हैं

तीन पीढ़ियां बड़ी हो गईं, विधायक आज भी गोपाल भार्गव हैं

2
0

तीन पीढ़ियां बड़ी हो गईं, विधायक आज भी गोपाल भार्गव हैं

दादा से नाती तक एक ही जवाब – जब से होश संभाला, गोपाल भार्गव को ही विधायक देखा। आखिर चार दशक से ज्यादा समय से अजेय क्यों हैं भार्गव?
आखिर क्यों कहा जाता है उन्हें राजनीति का अजेय योद्धा?

अगर मैं राजनीति में आया तो सागर संभाग की राजनीति को समझने और सीखने के लिए किसी एक व्यक्ति को चुनना हो, तो मेरी पहली पसंद गोपाल भार्गव होंगे। यह पसंद किसी राजनीतिक दल, विचारधारा या व्यक्तिगत पसंद के कारण नहीं, बल्कि राजनीति को समझने के कारण होगी। क्योंकि गोपाल भार्गव ने राजनीति में वह मुकाम बनाया है, जिसे समझना किसी राजनीतिक विद्यार्थी के लिए अपने आप में एक पाठशाला है।

राजनीति में किसी नेता को ‘अजेय’ की उपाधि मिलना कोई छोटी बात नहीं होती। और अगर यह उपाधि किसी ऐसे नेता के लिए इस्तेमाल हो, जो 1985 से लगातार एक ही विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतता आये हों, तो उसके पीछे केवल चुनावी गणित नहीं होता। वहां कुछ और होता है। लोगों के बीच बनाई गई वह स्वीकार्यता, राजनीतिक सूझबूझ, व्यक्तिगत संपर्क और सबसे महत्वपूर्ण वह भरोसा, जो वर्षों में बनता है।

गोपाल भार्गव के मामले में उनके सामने कितने लोग आए और कितने हार गए, इसकी पूरी गिनती करने बैठेंगे तो शायद पढ़ने वाले बोर होने लगें। इसलिए सीधी बात यही है। उनके सामने जो भी आया, उसे हार का सामना ही करना पड़ा।

रहली विधानसभा में 1985 से जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह 1990, 1993, 1998, 2003, 2008, 2013 और 2018 से होता हुआ 2023 में लगातार नौवीं जीत तक पहुंच गया। 2023 की जीत के बाद वे मध्यप्रदेश के सबसे अनुभवी विधायकों में शुमार हुए।

लेकिन अब असली सवाल यह नहीं है कि गोपाल भार्गव कितनी बार जीते?

असली सवाल यह है कि उनके सामने जीतना इतना कठिन क्यों होता चला गया?

यही वह सवाल है, जिसका जवाब शायद रहली विधानसभा में उनके आसपास रहने वाले बहुत से लोग भी पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं।

स्थिति यह है कि लोग गोपाल भार्गव से जीतने को ऐसी कसक मानने लगे हैं, जिसे पूरा करना उनके राजनीतिक विरोधियों को लगभग असंभव सा लगने लगा है। यह केवल नौ चुनाव जीतने की कहानी नहीं है। यह लगातार मजबूत होती उस राजनीतिक जमीन की कहानी है, जिसे गोपाल भार्गव ने चार दशक से अधिक समय में तैयार किया है।

और इसीलिए जब रहली विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का कोई बड़ा नेता आता है। चाहे वह प्रदेश का मुख्यमंत्री हो या देश का प्रधानमंत्री। तो शायद भार्गव का नाम वहां किसी परिचय का मोहताज नहीं होता। धीरे से कान में सिर्फ इतना कह देना पर्याप्त होगा.. अजेय योद्धा।

इसे केवल इस नजर से मत देखिए कि वह सातवीं, आठवीं या नौवीं बार चुनाव जीत चुके हैं। इसे उस क्रम के रूप में देखिए, जो लगातार बढ़ता गया और जिसके सामने हर चुनाव के साथ चुनौती देने वालों की मुश्किल बढ़ती चली गई।

हां, एक रुकावट दिखाई देती है.. उम्र।

लेकिन यहां भी ठहरिए।

गोपाल भार्गव की उम्र आज 74 वर्ष है। मध्यप्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी जन्मतिथि 1 जुलाई 1952 दर्ज है। लेकिन उनकी सक्रियता को देखकर उम्र को उनकी कमजोरी मान लेना शायद सबसे बड़ी भूल होगी।

सुबह हो, दोपहर हो या शाम, किसी उद्घाटन में, किसी विकास कार्य के बीच, क्षेत्र के लोगों की समस्या सुनते हुए या उसके निदान के लिए प्रयास करते हुए गोपाल भार्गव मिल जाएंगे।
रही बात रात की तो उसे भी गोपाल भार्गव को आराम करने का समय समझना गलती होगी।

आप उन्हें शाम सात बजे किसी शादी समारोह में देख सकते हैं और देर रात दो बजे तक घराती और बरातियों से बात करते हुए भी।
यही उनकी राजनीति का वह हिस्सा है, जिसे केवल चुनावी परिणाम देखकर समझना संभव नहीं है।

रहली विधानसभा क्षेत्र में दुर्घटना हो, कोई आपदा आए या कोई बड़ी घटना घटे, लोगों की नजर जिसकी तरफ जाती है, उनमें गोपाल भार्गव प्रमुख नाम हैं। घटना के कुछ ही समय बाद मौके पर उनकी मौजूदगी दिखाई देना उनकी राजनीतिक कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है।
और यह सक्रियता केवल अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
भोपाल में विधानसभा सत्र हो, राजधानी स्तर पर क्षेत्र के किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला हो या कोई ऐसा काम हो, जिसे प्रदेश स्तर पर उठाकर पूरा करवाना हो। गोपाल भार्गव वहां भी सक्रिय दिखाई देते हैं। फिर वो अपने गृह नगर गणनायक गढ़ाकोटा में भी उपलब्ध मिलते हैं।
यानी राजनीति उनके लिए केवल विधानसभा के भीतर बैठने का काम नहीं रही।
उनकी राजनीति का अर्थ है, क्षेत्र में रहना, लोगों के बीच रहना और जरूरत के समय उपलब्ध रहना।
शायद यही वह अंतर है, जिसे गोपाल भार्गव के आसपास रहकर भी कई लोग पूरी तरह समझ नहीं पाए।

उनकी जमीन इतनी मजबूत है कि उनसे जुड़ा हुआ व्यक्ति कई बार खुद को उस विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधि यानी विधायक समझने लगता है।
यही उनकी राजनीति का एक दिलचस्प पक्ष है।

रहली विधानसभा क्षेत्र के गांवों, नगरपालिका क्षेत्रों और कस्बों में आपसी टकराव होना असंभव नहीं है। हर जगह लोगों के बीच मतभेद होते हैं, विवाद होते हैं और कभी-कभी बड़े झगड़े भी होते हैं। लेकिन इन सबके बीच गोपाल भार्गव के संबंधों की एक अलग तस्वीर दिखाई देती है।
अधिकतर लोग उनसे सीधे जुड़े हुए हैं।
सबका उनसे घरोबा है।
और दिलचस्प बात यह है कि जब उन्हीं लोगों के बीच कोई बड़ा विवाद खड़ा होता है, तब भी गोपाल भार्गव के किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने या किसी के खिलाफ निर्णय लेने के बाद रिश्तों में वह टूटन दिखाई नहीं देती, जो सामान्यत ऐसी परिस्थितियों में दिखाई देती है।
क्यों?
क्योंकि गोपाल भार्गव जानते हैं कि किसके साथ न्याय होना चाहिए और असल दोषी कौन है।

शुरुआत में किसी को लग सकता है कि गोपाल भार्गव किसी एक पक्ष से मतभेद कर रहे हैं। लेकिन जब उनका निर्णय सामने आता है, तब दोनों पक्षों को समझ में आता है कि उन्होंने पीड़ित को न्याय दिलाने में कोई कमी नहीं की और दोषी को उसके हिस्से की सजा से बचाने में भी कोई मदद नहीं की।
और इससे भी बड़ी बात यह है कि रहली विधानसभा क्षेत्र के ऐसे अधिकांश मामलों में अंततः राजीनामा हो जाता है।

यानी विवाद किसी ने खड़ा किया, झगड़ा किसी का बना, लेकिन उसे खत्म करने और लोगों के बीच फिर से संबंध बनाने की जिम्मेदारी भी अंततः गोपाल भार्गव के पास ही आ जाती है।
यह किसी विधायक के लिए सामान्य बात नहीं है।
और यहां एक और गलतफहमी दूर करना जरूरी है।

यह मत सोचिए कि जो लोग गोपाल भार्गव के राजनीतिक विरोध में हैं, वे उनकी मदद से वंचित रह जाते हैं।

कम से कम उनके क्षेत्र में जनहित की योजनाओं और सरकारी लाभ के मामले में उनकी राजनीति को केवल समर्थक और विरोधी के चश्मे से देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा।

किसान को फसल बीमा की राशि मिले, कुआं या तालाब की योजना का लाभ मिले, खाद-बीज मिले या कुटीर एवं ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े दूसरे सरकारी लाभ। इन मामलों में गोपाल भार्गव की राजनीति में भेद दिखाई नहीं देता।

वह लाभ भाजपा के कार्यकर्ता के लिए हो या उनके राजनीतिक विरोधी के लिए। क्षेत्र की जनता को लाभ मिलना चाहिए, यह उनकी राजनीति का बड़ा हिस्सा रहा है।

शायद यही कारण है कि उनकी राजनीति केवल समर्थकों की राजनीति बनकर नहीं रह गई।
गोपाल भार्गव की राजनीतिक यात्रा को देखें तो तस्वीर और बड़ी हो जाती है।

वह छात्र राजनीति से निकले। 1970 से 1973 के बीच सागर विश्वविद्यालय छात्रसंघ में विभिन्न पदों पर रहे। 1980 से 1982 तक गढ़ाकोटा नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष रहे। छात्रों, बीड़ी मजदूरों और किसानों के आंदोलनों में भाग लिया और जेल यात्राएं भी कीं। 1985 में पहली बार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद लगातार चुनाव जीतते रहे।

2003 में उन्हें पहली बार मंत्री बनने का अवसर मिला और कृषि, राजस्व, सहकारिता, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व, पुनर्वास, खाद्य-नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण जैसे विभागों की जिम्मेदारी मिली। बाद में पंचायत एवं ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय, सहकारिता और अन्य महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारियां भी संभालीं।
लगातार लंबे समय तक मंत्री रहने के बाद 2018 में जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो वही गोपाल भार्गव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने। सत्ता बदली तो फिर मंत्री बने। सार्वजनिक रिकॉर्ड में उनके करीब 18 वर्ष तक मंत्री रहने का उल्लेख मिलता है।
यानी उनके पास सत्ता रही।
मंत्री पद रहा।
नेता प्रतिपक्ष का पद रहा।
विधानसभा का चार दशक से अधिक का अनुभव रहा।
लगातार नौ चुनाव जीतने का रिकॉर्ड रहा।

और इसके बावजूद उनकी राजनीति को समझने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद पद नहीं, बल्कि उनका व्यवहार है।
इतनी लंबी राजनीतिक यात्रा के बाद भी सार्वजनिक जीवन में उनके बारे में ऐसी बात आसानी से सामने नहीं आती कि लगातार चुनाव जीतने, मंत्री रहने और इतने लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहने का कोई मद या घमंड उनके व्यवहार पर हावी हो गया हो।
राजनीति में यह बात छोटी नहीं है।
क्योंकि सत्ता आदमी को बदल देती है।
पद आदमी के आसपास दूरी पैदा कर देता है।
लगातार जीत आदमी के भीतर अहंकार पैदा कर सकती है।

वह यह समझते हैं कि सत्ता आती-जाती है, मंत्री पद आता-जाता है, सरकारें बदलती हैं, चुनाव आते-जाते हैं।
लेकिन जनता के बीच बना रिश्ता अगर कायम रहे, तो नेता की राजनीतिक जमीन कायम रहती है।
गोपाल भार्गव की चार दशक से ज्यादा लंबी राजनीति शायद इसी एक सूत्र का परिणाम है।
इसीलिए उन्हें केवल नौ बार जीता हुआ विधायक मत देखिए।

उन्हें उस राजनीतिक प्रयोग के रूप में देखिए, जिसमें एक व्यक्ति ने चार दशक से अधिक समय तक एक ही विधानसभा क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को इतना मजबूत किया कि उनके सामने चुनाव जीतना ही विरोधियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया।

और यही वजह है कि अगर मुझे राजनीति सीखनी हो, तो सागर संभाग में मैं गोपाल भार्गव को केवल एक राजनेता के रूप में नहीं देखूंगा।

मैं उन्हें एक ऐसी राजनीतिक पाठशाला के रूप में देखूंगा, जहां सबसे बड़ा पाठ यही है। अजेय होने के लिए केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं होता, लोगों का भरोसा जीतना पड़ता है।

✍🏼 Shailendra Singh

@हाइलाइट Abhishek Gopal Bhargava