गुलाब सिंह 73 के, हीरा सिंह 69 के और गोविंद सिंह 65 के… उम्र बढ़ी, लेकिन सुबह से शाम तक रफ्तार वही
साधन-संपन्न परिवार के ये वरिष्ठ सदस्य सुबह घर से निकलते हैं और देर शाम तक अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में जुटे रहते हैं। कोई खेत में, कोई क्षेत्र और प्रशासन के बीच तो कोई सरकार और राजनीति में
सागर में किसी परिवार की पहचान उसके पद और राजनीतिक प्रभाव से होती है, तो किसी की सामाजिक पकड़ से। लेकिन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के परिवार को थोड़ा करीब से देखें तो एक और तस्वीर सामने आती है। उम्र बढ़ी है, लेकिन जिम्मेदारियों से जुड़ी सक्रियता आज भी बरकरार है।
यहां बात मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के साथ उनके बड़े भाई गुलाब सिंह और मझले भाई जिला पंचायत अध्यक्ष हीरा सिंह राजपूत की है।
परिवार साधन-संपन्न है। सुबह से शाम तक काम करने की कोई आर्थिक मजबूरी नहीं है। इसके बावजूद रोजमर्रा की दिनचर्या में जिम्मेदारियों से जुड़ाव और सक्रियता बनी हुई है। यही इस परिवार की इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है।
गुलाब सिंह की सुबह खेत से शुरू होती है
73 वर्षीय ताऊ गुलाब सिंह की सुबह खेतों के भ्रमण से शुरू होती है। खेत में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी वह स्वयं लेते हैं। वहां की गतिविधियों को देखते हैं और उनके वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा करते हैं।
इसके बाद दिन परिवार और विधानसभा क्षेत्र से जुड़े लोगों के संपर्क में गुजरता है। लोगों से मिलना, उनकी बातें सुनना और अपने स्तर पर उनसे जुड़े रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
धार्मिक आयोजनों और उन धार्मिक स्थलों पर भी उनकी नियमित मौजूदगी रहती है, जिनसे उनका जुड़ाव है और जहां वह मुख्य संरक्षक की भूमिका में हैं। वहां उनकी मौजूदगी केवल औपचारिक नहीं रहती। लोगों के बीच बैठना, बातचीत करना और उनके साथ समय बिताना भी उनकी दिनचर्या में शामिल है।
73 वर्ष की उम्र में सुबह खेत से निकलकर दिनभर सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहना निश्चित तौर पर ध्यान खींचता है।
हीरा सिंह राजपूत की नजर क्षेत्र और प्रशासन पर
मझले भाई और जिला पंचायत अध्यक्ष हीरा सिंह राजपूत की उम्र 69 वर्ष है। जिला पंचायत की जिम्मेदारी के साथ सुरखी विधानसभा क्षेत्र से जुड़े काम भी उनकी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
क्षेत्र की कोई समस्या हो, उसके समाधान के लिए किसी अधिकारी से बातचीत करनी हो या किसी काम की प्रगति जाननी हो। उनका अधिकारियों से लगातार संपर्क बना रहता है।
इसके साथ रॉयल पैलेस होटल और उससे जुड़े निर्णय भी उनकी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों में शामिल हैं।
एक ओर जिला पंचायत का दायित्व, दूसरी ओर क्षेत्र से जुड़ी जिम्मेदारियां और साथ में अन्य काम। 69 वर्ष की उम्र में भी इन सबके बीच लगातार सक्रिय बने रहना उनकी दिनचर्या की एक खास तस्वीर सामने रखता है।
65 वर्ष की उम्र में मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की सक्रियता
अब बात मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की।
65 वर्ष की उम्र में उनकी जिम्मेदारियों का दायरा स्वाभाविक रूप से बड़ा है। मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री होने के साथ विधानसभा क्षेत्र, अधिकारियों, संगठन और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ी व्यस्तताएं उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका और सागर संभाग की राजनीति में उनका प्रभाव लंबे समय से चर्चा में रहा है। दूसरी तरफ विपक्ष भी उन पर लगातार हमलावर रहता है। SIT जांच, आय से अधिक संपत्ति सहित अलग-अलग आरोपों को लेकर राजनीतिक बहस होती रही है।
लेकिन इन राजनीतिक विवादों के बीच उनकी सार्वजनिक सक्रियता लगातार बनी हुई है। क्षेत्र के लोगों से संपर्क, अधिकारियों से बातचीत, राजनीतिक कार्यक्रम और संगठन से जुड़ी गतिविधियां उनकी दिनचर्या में लगातार चलती रहती हैं।
परिवार की अगली पीढ़ी की कहानी फिर कभी
इस परिवार की अगली पीढ़ी भी अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय है। किसी का जुड़ाव राजनीति से है, कोई शिक्षा के क्षेत्र में है, कोई खेती-किसानी से जुड़ा है और परिवार के कई सदस्य अपने व्यावसायिक कारोबार को संभाल रहे हैं।
इनकी दिनचर्या भी सुबह घर से निकलने और देर शाम तक अपनी जिम्मेदारियों में लगे रहने की बताई जाती है।
आज 30-40 की उम्र में ही बहुत से लोग खुद को उम्रदराज मानकर अपनी सक्रियता सीमित करने लगते हैं। ऐसे समय में 65,69 और 73 वर्ष की उम्र के इस पड़ाव पर भी सुबह से शाम तक जिम्मेदारियों के बीच सक्रिय रहना एक अलग संदेश जरूर देता है।
सवाल फिर वही है। सक्रिय रहने के लिए उम्र बड़ी होती है या सोच?
बुंदेलखंड के अपने अंदाज में कहें तो आदमी की असली पहचान केवल उनके साधन या पद से नहीं होती। यह भी मायने रखता है कि सुबह घर से निकलने के बाद दिन ढलने तक वह अपनी जिम्मेदारियों के लिए कितना समय देते हैं।
यह परिवार की कहानी में फिलहाल यही बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है। साधन-सुविधाएं अपनी जगह हैं, लेकिन काम और जिम्मेदारी से जुड़े रहने की आदत आज भी कायम है।
यह कहानी फिलहाल यहीं तक। परिवार की अगली पीढ़ी की सक्रियता पर बात फिर कभी करते हैं।
✍🏼 Shailendra Singh






