रहली में गोपाल भार्गव का ‘राजनीतिक गणित’ आखिर क्या है?
कांग्रेस हर बार चेहरा बदलती रही, भार्गव डटे रहे… क्या विरोधियों की नाराजगी भी उनके लिए चुनावी हथियार बनी?
2028 के विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है। लेकिन रहली की राजनीति को समझने के लिए 2028 का इंतजार करने की जरूरत नहीं। पिछले चार दशक के चुनावी इतिहास के पन्ने पलटिए, कई ऐसे सवाल सामने आते हैं जिनके जवाब आने वाले चुनाव की तस्वीर समझने में मदद कर सकते हैं।
सागर जिले की रहली विधानसभा सिर्फ इसलिए चर्चा में नहीं रहती कि यहां से गोपाल भार्गव लगातार चुनाव जीतते आए हैं। असली राजनीतिक कहानी यह है कि भार्गव के सामने कांग्रेस ने कई चेहरे आजमाए, लेकिन कोई ऐसा चेहरा स्थायी चुनौती के रूप में विकसित नहीं हो पाया जो एक चुनाव हारने के बाद उसी अनुभव के साथ अगली बार और मजबूत होकर लौटता।
क्या यह केवल कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरी थी?
या फिर गोपाल भार्गव की राजनीति में विपक्ष की कमजोरियों को पहचानकर उनका लाभ उठाने की कोई ऐसी रणनीति भी रही, जिसकी चर्चा रहली की राजनीति में होती रही है?
इसे साबित करने वाला हमारे पास कोई दस्तावेज नहीं है। लेकिन सवाल जरूर हैं। और चुनावी इतिहास उन सवालों को खड़ा करने के लिए पर्याप्त सामग्री देता है।
1985 के बाद बदला कांग्रेस का चेहरा, नहीं बदली भार्गव की जीत
रहली में गोपाल भार्गव का राजनीतिक वर्चस्व चार दशक पुराना है।
1985 से लेकर 2023 तक कांग्रेस ने अलग-अलग समय पर अलग-अलग चेहरों को मैदान में उतारा। कहीं मुकाबला कड़ा हुआ, कहीं एकतरफा रहा। लेकिन भार्गव लगातार अपनी राजनीतिक जमीन बचाते रहे।
यहां कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह किसी एक उम्मीदवार को लंबे समय तक तैयार नहीं कर सकी।
और यही वह जगह है जहां रहली की चुनावी कहानी बाकी सीटों से अलग दिखाई देती है।
क्योंकि एक मजबूत उम्मीदवार की ताकत केवल चुनाव लड़ने से नहीं बनती। उसे क्षेत्र में लगातार काम करना पड़ता है, हार की कमियों को समझना पड़ता है, संगठन बनाना पड़ता है और अगले चुनाव तक अपने समर्थकों को साथ रखना पड़ता है।
कांग्रेस के सामने यह प्रक्रिया बार-बार टूटती रही।
लेकिन एक अपवाद . जीवन पटेल
रहली की पूरी कहानी में जीवन पटेल का मामला सबसे दिलचस्प है।
कांग्रेस ने उन्हें दो बार गोपाल भार्गव के सामने उतारा।
1998 में जीवन पटेल ने भार्गव को कड़ी टक्कर दी। दोनों के बीच जीत का अंतर करीब 8 हजार वोट रहा।
यानी उस समय कांग्रेस के पास ऐसा उम्मीदवार था जिसने भार्गव के मजबूत किले में सेंध लगाने की वास्तविक क्षमता दिखाई थी।
लेकिन इसके बाद क्या हुआ?
2003 में कांग्रेस ने जीवन पटेल की जगह अवधेश हजारी को मैदान में उतार दिया।
यानी जिस उम्मीदवार ने पिछली बार भार्गव को सबसे कड़े मुकाबलों में से एक दिया था, उसे अगले चुनाव में दोबारा मौका नहीं मिला।
फिर 2008 में कांग्रेस ने जीवन पटेल को वापस मैदान में उतारा।
लेकिन इस बार तस्वीर बदल चुकी थी।
भार्गव जीत गए और अंतर पहले से काफी बढ़ गया।
इसके बाद जीवन पटेल फिर कांग्रेस के स्थायी उम्मीदवार नहीं बन पाए।
यहीं से सवाल पैदा होता है
अगर 1998 में जीवन पटेल ने भार्गव को महज करीब आठ हजार वोटों से पीछे छोड़ा था, तो क्या कांग्रेस ने उस मुकाबले से कोई सबक लिया?
क्या उन्हें लगातार मौका मिलता तो वह अगले चुनावों में और मजबूत हो सकते थे?
या फिर कांग्रेस को लगा कि रहली में नया चेहरा ही भार्गव को हरा सकता है?
यह सवाल आज भी कांग्रेस की रणनीति पर खड़ा होता है।
फिर 2018 आया… और कहानी ने एक और सवाल छोड़ दिया
2018 में कांग्रेस ने कमलेश साहू को गोपाल भार्गव के सामने उतारा।
यह मुकाबला भी कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण था।
भार्गव जीते, लेकिन कांग्रेस पूरी तरह मुकाबले से बाहर नहीं थी। हार का अंतर करीब 27 हजार वोट रहा।
अब सामान्य राजनीतिक रणनीति क्या होती?
हार की कमियों को पहचाना जाता।
उम्मीदवार के साथ संगठन खड़ा किया जाता।
उसे अगले पांच साल क्षेत्र में काम करने दिया जाता।
और फिर अगली बार उसी चेहरे को पहले से मजबूत करके मैदान में उतारा जाता।
लेकिन 2023 में कांग्रेस ने फिर चेहरा बदल दिया।
कमलेश साहू की जगह ज्योति पटेल को मैदान में उतारा गया।
नतीजा..भार्गव की जीत का अंतर करीब 72 हजार वोट तक पहुंच गया।
यह आंकड़ा अपने आप में कांग्रेस की रणनीति पर बड़ा सवाल है।
क्या 2018 में अपेक्षाकृत मजबूत मुकाबला देने वाले उम्मीदवार को पांच साल और काम करने का मौका मिलता तो मुकाबला अलग हो सकता था?
इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है।
लेकिन राजनीति में यह सवाल पूछना जरूरी है।
अब आते हैं उस आरोप पर, जो रहली की राजनीति को और दिलचस्प बना देता है
राजनीति में हर चुनाव में टिकट के कई दावेदार होते हैं।
एक को टिकट मिलता है।
बाकी दावेदारों में कोई संतुष्ट होता है, कोई नाराज।
किसी को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ।
कोई खुलकर बगावत करता है तो कोई भीतर ही भीतर दूरी बना लेता है।
रहली में आरोप यह लगता रहा है कि गोपाल भार्गव केवल कांग्रेस के घोषित उम्मीदवार पर नजर नहीं रखते थे, बल्कि कांग्रेस के भीतर टिकट की दौड़ में शामिल नेताओं और टिकट नहीं मिलने के बाद नाराज होने वाले नेताओं के राजनीतिक तेवरों पर भी नजर रखते थे।
आरोप यह है कि भार्गव की रणनीति कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक को सीधे चुनौती देने की बजाय उसकी अंदरूनी दरारों का राजनीतिक फायदा उठाने की रही।
यानी लड़ाई सिर्फ कांग्रेस उम्मीदवार से नहीं.. कांग्रेस के भीतर पैदा होने वाली असहमति से भी।
यह आरोप है।
इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण हमारे पास नहीं है।
लेकिन 2023 की एक घटना इस आरोप पर चर्चा का आधार जरूर देती है।
2023 कांग्रेस का मंच और खुलकर सामने आया अंदरूनी विवाद
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ज्योति पटेल को प्रत्याशी बनाया।
चुनाव के दौरान कांग्रेस के एक कार्यक्रम में मंच पर ही ज्योति पटेल और पूर्व कांग्रेस प्रत्याशी जीवन पटेल के बीच विवाद की स्थिति सामने आई।
विवाद इतना बढ़ा कि बात तीखी बहस से आगे निकल गई।
ज्योति पटेल और उनके भाई की ओर से जीवन पटेल के खिलाफ “जूते मारो साले को” जैसे शब्द कहे जाने की घटना सामने आई। ज्योति पटेल के भाई और जीवन पटेल के बीच झूमाझटकी की स्थिति भी बनी।
इस घटनाक्रम का वीडियो सामने आया और उस समय यह मामला समाचारों में सुर्खियों में रहा।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जीवन पटेल कांग्रेस के लिए कोई अनजान चेहरा नहीं थे।
वही जीवन पटेल, जिन्हें कांग्रेस पहले गोपाल भार्गव के सामने उतार चुकी थी।
एक समय भार्गव के खिलाफ कड़ा मुकाबला देने वाला यह नेता बाद में कांग्रेस के ही मंच पर विवाद में नजर आया।
यही तस्वीर रहली की राजनीति के उस सवाल को फिर सामने लाती है
क्या कांग्रेस अपने पुराने नेताओं, टिकट के दावेदारों और नए उम्मीदवार के बीच ऐसा मजबूत तालमेल बना पाती है कि चुनाव आते-आते पूरा संगठन एकजुट होकर भार्गव के सामने खड़ा हो?
क्या भार्गव की रणनीति ‘विपक्ष को हराना’ थी या विपक्ष को एकजुट नहीं होने देना?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
किसी मजबूत नेता के लिए चुनाव जीतने का सबसे आसान रास्ता हमेशा अपने वोट बढ़ाना नहीं होता।
कई बार विपक्ष के वोटों को एकजुट होने से रोकना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
रहली में भार्गव पर लगने वाला राजनीतिक आरोप इसी दिशा में है।
आरोप यह है कि वे कांग्रेस के उन नेताओं पर नजर रखते थे जो टिकट की दौड़ में थे, जो टिकट से नाराज थे या जिन्हें लगता था कि पार्टी ने उनके साथ न्याय नहीं किया।
किसी को अपने पक्ष में करना जरूरी नहीं।
सिर्फ इतना भी काफी हो सकता है कि वह कांग्रेस के उम्मीदवार के साथ पूरी ताकत से न खड़ा हो।
यही राजनीति का वह ‘ग्रे एरिया’ है, जहां कोई सीधा प्रमाण आसानी से नहीं मिलता, लेकिन चुनावी नतीजों पर उसका असर पड़ सकता है।
क्या कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अपनी अंदरूनी राजनीति रही?
रहली में कांग्रेस के पास वोट बैंक रहा है।
उसके पास पुराने नेता रहे हैं।
उसके पास चुनाव लड़ चुके चेहरे रहे हैं।
उसके पास ऐसे उम्मीदवार भी रहे हैं जिन्होंने कभी भार्गव को अपेक्षाकृत कड़ी चुनौती दी।
फिर भी कांग्रेस कोई स्थायी विकल्प क्यों नहीं बना सकी?
क्या समस्या उम्मीदवारों में थी?
क्या संगठन में थी?
क्या टिकट वितरण में थी?
या फिर पार्टी अपने ही दावेदारों को चुनाव के बाद साथ लेकर चलने में नाकाम रही?
अगर एक उम्मीदवार हारता है और अगली बार उसकी जगह दूसरा आ जाता है, तो नए उम्मीदवार को फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ती है।
भार्गव के साथ ऐसा नहीं हुआ।
वह हर चुनाव में उसी राजनीतिक जमीन पर लौटे जिसे उन्होंने वर्षों में बनाया था।
यही है भार्गव बनाम कांग्रेस की असली कहानी
गोपाल भार्गव की लगातार जीत को केवल यह कहकर समझना आसान है कि वे लोकप्रिय हैं।
यह भी कहा जा सकता है कि उनकी संगठनात्मक पकड़ मजबूत है।
लेकिन एक राजनीतिक विश्लेषण इससे आगे जाना चाहता है।
विपक्ष की कमजोरी भी किसी मजबूत नेता की ताकत बनती है।
रहली में कांग्रेस का बदलता चेहरा, टिकट के दावेदारों की महत्वाकांक्षा, चुनाव के दौरान दिखाई देने वाली अंदरूनी खींचतान और पुराने उम्मीदवारों को लगातार राजनीतिक विकल्प के रूप में तैयार न कर पाना इन सबको एक साथ रखकर देखें तो एक तस्वीर बनती है।
और उसी तस्वीर के बीच सवाल खड़ा होता है
क्या गोपाल भार्गव ने कांग्रेस को हराने से ज्यादा कांग्रेस को एकजुट होने से रोकने की राजनीति समझी?
इस सवाल का फैसला पाठक करें।
2028 से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल
अभी 2028 का चुनाव दूर है।
कांग्रेस के पास समय है।
वह चाहे तो पिछले चार दशक के चुनावी इतिहास से सबक ले सकती है।
एक उम्मीदवार चुने।
उसे लगातार मैदान में रखे।
टिकट के दूसरे दावेदारों को साथ लेकर चले।
पुराने नेताओं को सम्मान और भूमिका दे।
हारने वाले उम्मीदवार को खत्म करने के बजाय उसकी कमियों को दूर करे।
और सबसे जरूरी
भार्गव के खिलाफ सिर्फ चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार नहीं, बल्कि पांच साल तक क्षेत्र में रहने वाला राजनीतिक विकल्प तैयार करे।
क्योंकि रहली का इतिहास एक बात बहुत साफ कहता है
गोपाल भार्गव को हराने के लिए चुनाव के छह महीने पहले उम्मीदवार तलाशना शायद पर्याप्त नहीं होगा।
और अगर कांग्रेस फिर वही पुरानी गलती दोहराती है तो 2028 का चुनाव भी सिर्फ एक और चुनाव बनकर रह सकता है।
लेकिन अगर कांग्रेस अपने भीतर की दरारें भरकर किसी एक चेहरे के पीछे पूरी ताकत से खड़ी होती है, तो चार दशक पुरानी इस राजनीतिक कहानी में पहली बार कोई नया अध्याय भी लिखा जा सकता है।
सवाल अब गोपाल भार्गव से ज्यादा कांग्रेस की रणनीति पर है।
क्या 2028 तक कांग्रेस अपना चेहरा खोजेगी या एक बार फिर चेहरा बदल देगी?
✍🏼 Shailendra Singh






