बुधनी में शिवराज का मोर्चा और सागर में भूपेंद्र सिंह की घेराबंदी.. नाम मिटाने की होड़ में बेलगाम हुए अफसर
भोपाल/सागर। सत्ता के गलियारों में अनुशासन का मुखौटा पहनकर चलने वाली मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर इस समय एक ऐसा राजनीतिक खेल चल रहा है, जिसकी कल्पना शायद आम कार्यकर्ताओं ने कभी नहीं की होगी। गृह मंत्री Amit Shah के हालिया भोपाल दौरे के दौरान बंद कमरों में जब मंत्रियों ने मुख्यमंत्री Dr Mohan Yadav की संवेदनहीनता और मुलाकात न देने की शिकायतें की थीं, तब केवल चिंगारी दिखी थी। लेकिन बुधनी से लेकर सागर तक जो कड़ियाँ अब जुड़ रही हैं, वे यह साबित करने के लिए काफी हैं कि मध्य प्रदेश की धरती पर इस समय एक सोची-समझी क्रूर स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है। शिवराज सिंह चौहान और उनके वफादारों का राजनीतिक वजूद पूरी तरह मिटा देना।
बुधनी का वह मार्मिक मंजर, अपनों के ही बुलडोजर ने जब उजाड़ दी मामा की साख
इस वीभत्स राजनीतिक बिसात की शुरुआत केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के अपने ही गढ़ बुधनी के कोसमी गांव से होती है। उस दृश्य की मार्मिकता को समझिए, कड़ाके की धूप में बिलखते आदिवासी बच्चे, मलबे में तब्दील हो चुकीं झोपड़ियाँ, मिट्टी से पाट दिया गया पीने के पानी का इकलौता कुआँ और पैरों तले रौंद दी गई मक्का व तुअर की लहलहाती फसलें। ये वही आदिवासी परिवार हैं, जिन्हें दो दशक तक शिवराज सिंह चौहान ने अपने भाई-बहन और भांजे-भांजियाँ कहकर गले लगाया।
दहला देने वाली बात यह है कि इस बर्बर कार्रवाई से पहले खुद केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्थानीय वन अधिकारियों और प्रशासनिक अमले को सख्त हिदायत दी थी कि इन गरीबों को न उजाड़ा जाए। लेकिन सत्ता के नए गलियारों से मिल रही हवा का नशा इस कदर हावी था कि वन विभाग के अफसरों ने केंद्रीय मंत्री की एक न सुनी और आदिवासियों की जिंदगी पर बुलडोजर चला दिया। जब इंतहा हो गई, तो दशकों तक सूबे की कमान संभालने वाले शिवराज सिंह को अपने सारे राष्ट्रीय कार्यक्रम रद्द कर कोसमी गांव की धूल में बैठना पड़ा। सरेआम रोते आदिवासियों के बीच जब शिवराज का गला रुंधा, तो उनके मुंह से अफसरों के लिए जल्लाद और नर-पिशाच जैसे शब्द निकले। उन्होंने भले ही इसे मुख्यमंत्री को बदनाम करने की साजिश कहा हो, लेकिन सच यह है कि यह सीधे तौर पर यह प्रमाणित करता है कि भोपाल के शीर्ष स्तर से यह अघोषित, लिखित और स्पष्ट आदेश है कि अब शिवराज सिंह चौहान की कोई भी बात नहीं सुनी जाएगी।
कसूर सिर्फ एक.. शिवराज का सबसे वफादार होना! सागर में भूपेंद्र सिंह की घेराबंदी
बुधनी में जो पैटर्न सीधे तौर पर दिखाई दिया, बुंदेलखंड के सागर जिले में वही खेल पिछले कई महीनों से परदे के पीछे से खेला जा रहा है। खुरई विधायक और पूर्व गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह आज अपनी ही सरकार में जिस तरह प्रताड़ित और उपेक्षित किए जा रहे हैं, उसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कसूर है, वे शिवराज सिंह चौहान के सबसे खास, उनके सबसे मजबूत रणनीतिकार और उनके संकटमोचक रहे हैं।
शिवराज मुक्त मध्य प्रदेश की स्क्रिप्ट लिखने वाले जानते हैं कि जब तक भूपेंद्र सिंह जैसे मजबूत खंभों को नहीं ढहाया जाएगा, तब तक शिवराज सिंह की जमीनी पकड़ को कमजोर नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि सागर की राजनीति में गुटबाजी को इस स्तर पर हवा दी गई कि भूपेंद्र सिंह को अपनी ही सरकार के कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के खिलाफ विधानसभा के पटल पर खड़ा होना पड़ा। भूपेंद्र सिंह ने चीख-चीख कर सदन को बताया कि सागर जिले में भय और आतंक का माहौल बनाकर गरीबों और आदिवासियों की लगभग 500 एकड़ सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। अपनी ही पार्टी की सरकार में एक पूर्व गृहमंत्री का यह दर्द क्या केवल एक क्षेत्रीय विवाद है? बिल्कुल नहीं, यह भूपेंद्र सिंह को मानसिक और राजनीतिक रूप से तोड़ने का सुनियोजित प्रयास है।
अपशब्दों की बौछार पर मौन प्रशासन.. बड़ा संरक्षण बेनकाब
सागर की पत्रकारिता से जुड़े लोग और आम जनता इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि किस तरह भोपाल के पत्रकार और अभिषेक जैन भोपाल द्वारा सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों से पूर्व गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह के खिलाफ लगातार बेहद अमर्यादित, तीखे और अपशब्दों से भरे हमले किए जा रहे हैं। एक सिटिंग विधायक और राज्य के पूर्व गृहमंत्री के चरित्र हनन की इस घटिया कोशिश के बावजूद, जिला पुलिस और भोपाल प्रशासन का मौन रहना यह साफ गवाही देता है कि इन हमलावरों की पीठ पर भोपाल के सबसे शक्तिशाली पावर सेंटर का हाथ है।
नौकरशाही और पुलिस को ऊपर से साफ इशारा है कि भूपेंद्र सिंह के मामले में कानून को अंधा और बहरा बनकर रहना है।
चिर-प्रतिद्वंद्वी को भाजपा में लाकर चक्रव्यूह तैयार
इस बिसात की सबसे खतरनाक चाल खुरई विधानसभा क्षेत्र के भीतर चली गई। भूपेंद्र सिंह के सबसे पुराने और धुर-विरोधी रहे पूर्व विधायक अरुणोदय चौबे को मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के जरिए रातों-रात भाजपा का गमछा पहना दिया गया। अरुणोदय चौबे को भाजपा में लाने का एकमात्र मकसद खुरई के भीतर एक समानांतर सत्ता केंद्र खड़ा करना था। आज अरुणोदय चौबे इशारों-इशारों में लगातार भूपेंद्र सिंह की घेराबंदी कर रहे हैं। रणनीति साफ है भूपेंद्र सिंह को खुरई के भीतर ही इस कदर उलझाकर और प्रताड़ित करके रख दिया जाए कि वे न तो प्रदेश की राजनीति में दखल दे सकें और न ही दिल्ली में बैठे शिवराज सिंह चौहान के लिए कोई ताकत बन सकें।
फूट का भविष्य.. क्या अपनी ही कब्र खोद रही है भाजपा?
केंद्रीय नेतृत्व और अमित शाह की यह सोच हो सकती है कि राज्यों में पीढ़ी परिवर्तन के लिए पुराने क्षत्रपों को दरकिनार करना जरूरी है। लेकिन मध्य प्रदेश में जो तरीका अपनाया जा रहा है, वह आत्मघाती है। बुधनी में आदिवासियों के आंसू और सागर में भूपेंद्र सिंह जैसी वफादार रीढ़ की हड्डी को तोड़ने की यह जिद भाजपा के पारंपरिक और समर्पित कैडर को भीतर से खोखला कर रही है। जब राज्य की नौकरशाही को यह समझ आ गया है कि पार्टी के सबसे बड़े नेताओं की ही कोई इज्जत नहीं बची है, तो वह आम जनता के प्रति पूरी तरह निरंकुश हो चुकी है।
अनुशासन के नाम पर चल रहा यह शीतयुद्ध अब थानों, सड़कों और जनता की अदालत में आ चुका है। अपनों को ही सताकर और मटियामेट करके लिखी जा रही यह नई सियासी इबारत भविष्य में मध्य प्रदेश भाजपा के अभेद्य किले को ढहाने की सबसे बड़ी वजह बनेगी।






