सागर मकरोनिया की बहुप्रतीक्षित एसएएफ बटालियन से नरवानी सड़क अब आखिरकार निर्माण की ओर बढ़ रही है। 4.30 किलोमीटर लंबी इस सड़क के लिए ₹9.87 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति मिलना क्षेत्र के लिए निश्चित ही बड़ी राहत की खबर है।
लेकिन इस विकास कार्य के साथ ही राजनीतिक श्रेय की दौड़ भी खुलकर सामने आ गई है।
सागर सांसद लता वानखेड़े और नरयावली विधायक प्रदीप लारिया, दोनों ने इस स्वीकृति को अपने-अपने प्रयासों का परिणाम बताते हुए सोशल मीडिया पर अलग-अलग पोस्ट साझा की हैं। दोनों पोस्ट पढ़ने पर एक बात स्पष्ट है। सड़क भले एक है, लेकिन उपलब्धि के दावे दो।
सांसद का दावा:
सांसद लता वानखेड़े ने इसे अपने प्रस्ताव पर मिली स्वीकृति बताया और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तथा लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह का आभार जताते हुए इसे सागर लोकसभा के विकास की दिशा में बड़ी उपलब्धि बताया।
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विधायक का पक्ष:
वहीं विधायक प्रदीप लारिया का कहना है कि यह सड़क 2023-24 के बजट सत्र में उनके प्रयासों से स्वीकृत हो चुकी थी, लेकिन तब प्रशासकीय अनुमति नहीं मिली थी। उनके अनुसार मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत भेंट और अनुपूरक बजट में विषय रखने के बाद अब जाकर वित्तीय व प्रशासकीय स्वीकृतियां मिली हैं। विधायक ने इसे विधानसभा क्षेत्र की ‘जीवन रेखा’ करार दिया है।
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सवाल जनता का है
इन दोनों दावों के बीच सवाल यह नहीं है कि श्रेय किसे मिले, बल्कि यह है कि
क्या विकास कार्यों को भी राजनीतिक पोस्टर बनना ज़रूरी है?
क्या जनता की वर्षों पुरानी मांग पूरी होने से पहले ही “मैं–मैं” की राजनीति शुरू हो जाना स्वाभाविक है?
हकीकत यह है कि यह सड़क क्षेत्र वासियों की जरूरत थी, और अगर सांसद-विधायक दोनों के प्रयास इसमें लगे हैं तो श्रेय साझा होना चाहिए, न कि विभाजित दिखने चाहिए थे।











