सागर की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस के सागर ग्रामीण अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह मोहासा को लेकर एक बुनियादी सवाल लगातार उठ रहा है। आखिर वे खुद की तुलना भाजपा के दिग्गज नेताओं से क्यों कर रहे हैं? यह सवाल किसी राजनीतिक विरोध से नहीं, बल्कि मौजूदा हालात और ज़मीनी हकीकत से पैदा हो रहा है।
भूपेन्द्र सिंह मोहासा उस कांग्रेस पार्टी से सागर ग्रामीण अध्यक्ष चुने गए हैं, जो मध्यप्रदेश में सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। यह दौर कांग्रेस के लिए आत्ममंथन, संगठन खड़ा करने और जमीनी संघर्ष का होना चाहिए। ऐसे समय में जिला अध्यक्ष का दायित्व व्यक्तिगत लोकप्रियता या ग्लैमर गढ़ने का नहीं, बल्कि डूबते संगठन को संभालने का होता है।
दिग्गज कौन हैं, और क्यों हैं
जिन भाजपा नेताओं से भूपेन्द्र सिंह मोहासा खुद की तुलना करते दिखाई देते हैं, वे सामान्य नेता नहीं हैं।
गोविंद सिंह वर्तमान में मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री हैं।
गोपाल भार्गव वर्तमान में विधायक हैं और पहले मंत्री पद संभाल चुके हैं।
भूपेन्द्र सिंह वर्तमान में विधायक हैं और पूर्व में प्रदेश के गृहमंत्री रह चुके हैं।
ये तीनों नेता सिर्फ पदधारी नहीं, बल्कि कई बार जनता द्वारा चुने गए, दशकों से सक्रिय और बेहद लोकप्रिय नेता हैं। इनकी सभाओं में भीड़ इसलिए नहीं आती कि वे पद पर हैं, बल्कि इसलिए आती है क्योंकि उन्होंने वर्षों तक अपनी-अपनी विधानसभा में काम किया, संघर्ष किया और जनता का भरोसा अर्जित किया। यही वह राजनीतिक पूंजी है, जिसका लाभ उन्हें आज भी मिल रहा है।
भूपेन्द्र सिंह मोहासा की राजनीतिक हकीकत
अब भूपेन्द्र सिंह मोहासा की राजनीतिक यात्रा पर नजर डालें, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
यह पहली बार है जब उन्हें जिले में कोई प्रभावशाली संगठनात्मक पद मिला है।
इसके पहले कांग्रेस पार्टी ने..
– न उन्हें कभी विधानसभा चुनाव का प्रत्याशी बनाया,
– न महापौर पद का उम्मीदवार,
– न ही कोई ऐसा दायित्व दिया, जिससे वे जिले के स्थापित नेता के रूप में उभर सकें।
– न कोई विधानसभा जीत, न नगर निगम का जनादेश, न ऐसा चुनावी इतिहास जो उन्हें दिग्गजों की श्रेणी में खड़ा करता हो। यह भी एक सच्चाई है कि कांग्रेस पार्टी ने स्वयं अब तक उन्हें चुनावी चेहरे के रूप में स्वीकार नहीं किया।
ऐसे में दिग्गजों जैसी लोकप्रियता, भीड़ और राजनीतिक वजन की अपेक्षा करना आत्मविश्वास नहीं, बल्कि हकीकत से दूरी को दर्शाता है।
संगठन बनाम स्व-प्रचार..
जमीनी कांग्रेस कार्यकर्ताओं और राजनीतिक जानकारों के बीच यह चर्चा आम है कि मौजूदा समय में कांग्रेस को भाजपा सरकार के गलत निर्णयों, नीतिगत विफलताओं और जनविरोधी फैसलों को उजागर करने की जरूरत है।
इसके साथ-साथ पार्टी को हर बूथ को मजबूत करना, पुराने, कार्यकर्ताओं को जोड़ना, नाराज़ नेताओं से संवाद करना और गांव-गांव में संगठन खड़ा करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन सागर में तस्वीर यह बनती दिख रही है कि संगठनात्मक ऊर्जा जमीन पर संघर्ष की जगह व्यक्तिगत छवि, ग्लैमर और तुलना की राजनीति में खर्च हो रही है। नतीजा यह है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में न वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी मजबूत दिखती है और न ही कार्यकर्ताओं में वह उत्साह नजर आता है, जिसकी एक जिला अध्यक्ष से उम्मीद की जाती है।
राजनीति का कड़वा सच..
राजनीति का एक स्थापित नियम है भीड़ पद से नहीं, जनादेश और भरोसे से आती है और भरोसा सोशल छवि से नहीं, बल्कि लगातार जमीन पर काम से बनता है। जिन भाजपा नेताओं से भूपेन्द्र सिंह मोहासा तुलना कर रहे हैं, उन्होंने यह भरोसा वर्षों में कमाया है। इसके मुकाबले पहली बार मिले संगठनात्मक पद के साथ उसी स्तर की अपेक्षा रखना सागर की सियासत में खुद को भ्रम में रखने जैसा है।
अभी भी मौका है..
भूपेन्द्र सिंह मोहासा के सामने अभी भी विकल्प खुला है। वे चाहें तो दिग्गजों से तुलना की राजनीति छोड़कर अपनी वास्तविक भूमिका समझें। संगठनकर्ता की भूमिका यदि उनका फोकस ग्लैमर से हटकर जमीन पर काम, बूथ स्तर की मजबूती और कांग्रेस को फिर से खड़ा करने पर जाता है, तो पार्टी को दिशा मिल सकती है।
लेकिन यदि तुलना और आत्मप्रचार ही प्राथमिकता बनी रही, तो यह दूरी केवल भीड़ से नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य से भी बढ़ती चली जाएगी।
कांग्रेस ग्रामीण जिला अध्यक्ष जैसे पद के लिए जिस राजनीतिक कद, संघर्ष और ज़मीनी पकड़ की ज़रूरत होती है, उसके आसपास भी मोहासा नज़र नहीं आते। आत्ममुग्धता और निजी ग्लैमर में उलझा यह नेतृत्व उस वक्त कांग्रेस के चेहरे के रूप में खड़ा है, जब पार्टी का जनाधार तेज़ी से खिसक रहा है। न दिशा है, न जनसंवाद , ऐसे में मोहासा उम्मीद नहीं, कांग्रेस की नाउम्मीदी का नाम बनते जा रहे हैं।











