सागर जिले में क्षत्रिय समाज की संगठनात्मक राजनीति अचानक ठहराव की स्थिति में दिख रही है। जिन दो संगठनों का उदय कभी राजनीतिक खींचतान की पृष्ठभूमि में हुआ था, वही अब लगभग निष्क्रियता की कगार पर नजर आ रहे हैं।
जातीय संगठनों का मूल उद्देश्य समाज के उन वर्गों की आवाज बनना होता है, जो अन्याय, आर्थिक कमजोरी या सामाजिक उपेक्षा का सामना कर रहे हों। लेकिन बीते समय में जिले में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां समाज को सामूहिक हस्तक्षेप की जरूरत थी फिर भी संगठन के जिलाध्यक्ष या पदाधिकारी सक्रिय रूप से मदद के लिए सामने आते कम ही दिखे। अब तक ऐसा कोई ठोस उदाहरण सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि इन मंचों से समाज का व्यापक भला हुआ हो।
दो खेमे, दो चेहरे
जिले में एक ओर क्षत्रिय महासभा को खुरई विधायक एवं पूर्व गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह से जोड़ा जाता रहा, तो दूसरी ओर क्षत्रिय समाज संगठन को जिले के मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के प्रभाव क्षेत्र का माना गया।
पहले संगठन की कमान लखन सिंह (भूपेंद्र सिंह के भतीजे) को और दूसरे की जिम्मेदारी नीरज सिंह नया खेड़ा को सौंपी गई। दोनों ओर कार्यकारिणी गठन में जल्दबाजी और प्रतिस्पर्धा साफ झलकती रही।
एक तरफ होटल दीपाली, तो दूसरी तरफ किला कोठी। बैठकों, विस्तार और एकता के दावों का सिलसिला चलता रहा। समाज को एकत्रित करने की बातें हुईं, शक्ति प्रदर्शन भी हुआ, लेकिन चर्चा यह भी रही कि इन संगठनों के गठन में निजी राजनीतिक हित प्रमुख थे।
जो लोग पहले से इन दोनों गुटों से जुड़े थे, उनकी अपनी राजनीतिक मजबूरियां थीं। पर जो बेवजह इस टकराव की राजनीति में कूद पड़े, वे अब असहज स्थिति में हैं। उन्होंने जो कटुता और बैर सार्वजनिक मंचों पर दिखाया, उसका दायित्व अंततः उन्हें ही उठाना पड़ सकता है।
टकराव से ठहराव तक
यह सर्वविदित है कि इन संगठनों की पृष्ठभूमि में दोनों दिग्गज नेताओं के बीच राजनीतिक टसल रही, जिसे प्रदेश की भाजपा राजनीति में भी अहम माना जाता था।
जब प्रदेश अध्यक्ष वी.डी. शर्मा और मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दोनों के बीच सुलह के प्रयास तेज किए, तो धीरे-धीरे तल्खी कम होती गई।
अब पहले जैसी खुली जुबानी जंग या जमीनी मुकाबला नहीं दिखता। कभी-कभार एक-दूसरे की विधानसभा में सक्रियता के दौरान हल्की तकरार जरूर दिखती है, पर व्यापक संघर्ष पर फिलहाल विराम है। ऊपर सुलह हुई तो नीचे संगठन स्वतः शांत पड़ गए। यही सबसे बड़ा संकेत है कि असली शक्ति कहां थी।
समर्थकों के लिए सबक
इस पूरे घटनाक्रम ने समर्थकों को एक बड़ा संदेश दिया है..
जब शीर्ष नेतृत्व आमने-सामने हो, तो अति उत्साह में कूदना अक्सर आत्मघाती साबित होता है। बड़े नेता आज विरोध में हों, तो कल साथ भी आ सकते हैं।
लेकिन जो लोग खुले मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हुए, बयानबाजी की, निजी हमले किए या टकराव को हवा दी वे अब दोनों दिग्गजों की नजर में खटक सकते हैं। राजनीति में समझौते हो जाते हैं, पर सूची भी बनती है।
“दो नाव की सवारी” करने वाले और टकराव के दौर में निजी लाभ साधने वाले भी अछूते नहीं रहते। राजनीति की स्मृति लंबी होती है और उसका प्रतिफल भी।
फिलहाल सागर में क्षत्रिय संगठनों की राजनीति शांति की चादर ओढ़े है। पर यह शांति स्थायी है या तूफान से पहले का सन्नाटा, यह आने वाला समय तय करेगा।












