मैं ब्राह्मणों का समर्थन इसलिए नहीं कर रहा कि वे मुझे सिर-आंखों पर बिठाएँ। मुझे किसी समाज से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए।
लेकिन मैं यह भी साफ कर दूँ ..किसी एक जाति को खलनायक बनाकर पेश करने की राजनीति का हिस्सा मैं नहीं बन सकता।
मैंने देखा है, समझा है और इस पर गहराई से अध्ययन भी किया है। एक तय शब्दावली गढ़ी गई ..चालाक, षड्यंत्रकारी, जातिवादी। और फिर उसे बार-बार दोहराया गया, ताकि वही “सच” लगने लगे।
क्या ब्राह्मण समाज में गलत लोग नहीं हैं? होंगे।
लेकिन क्या मेरी अपनी राजपूत जाति में नहीं हैं? हैं।
क्या किसी और जाति में नहीं मिलेंगे? मिलेंगे।
फिर सवाल सीधा है.. अगर दोष हर समाज में है, तो उंगली सिर्फ एक पर क्यों?
मुझे यह बिल्कुल स्पष्ट दिखता है कि यह सब स्वतःस्फूर्त नहीं लगता। जिस तरह से लगातार एक ही वर्ग को घेरा जा रहा है, उससे यह संदेह स्वाभाविक है कि इसके पीछे कोई संगठित रणनीति काम कर रही है। यह भी सवाल उठना चाहिए कि क्या इस तरह के नैरेटिव को आगे बढ़ाने में बाकायदा संसाधन, प्लेटफॉर्म और संभवतः फंडिंग तक झोंकी जा रही है?
जो लोग इस अभियान को दिशा दे रहे हैं, वे अपनी चाल पर चाल चल रहे हैं। पर दया उन लोगों पर आती है जो आज इस मुहिम में शामिल होकर ताली बजा रहे हैं। उन्हें शायद एहसास नहीं कि आज ब्राह्मण निशाने पर हैं, तो कल कोई और होगा.. और यह चक्र किसी को भी नहीं बख्शता।
यह सिर्फ एक जाति का मुद्दा नहीं है। यदि किसी भी समुदाय को व्यवस्थित रूप से खलनायक बनाया जाता है, तो उसका असर व्यापक होता है। यह सामाजिक संतुलन को तोड़ता है, विश्वास की नींव को कमजोर करता है और अंततः हमारी सभ्यतागत जड़ों को चोट पहुँचाता है।
सनातन परंपरा की ताकत विविधता और संतुलन में रही है। अगर उसी ढांचे के भीतर दरार डालने की कोशिश होगी, तो उसका प्रभाव केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं रहेगा.. उसका असर पूरे समाज और देश पर पड़ेगा।
मैं उस भीड़ का हिस्सा नहीं बनूँगा जो तय एजेंडे के तहत उंगली उठाए।
मैं वहाँ खड़ा रहूँगा जहाँ न्याय खड़ा होगा.. चाहे वह लोकप्रिय हो या नहीं।
और जो लोग यह सोच रहे हैं कि ऐसी रणनीतियाँ स्थायी होंगी, वे याद रखें ..
समाज को तोड़ने की हर कोशिश अंततः उसी जमीन को कमजोर करती है, जिस पर हम सब खड़े हैं।











