सागर जिले में अवैध गैस रिफ़िलिंग कोई राज़ नहीं, बल्कि खुलेआम चलता कारोबार है जिसे रोकने का जिम्मा जिस विभाग पर है, वही इसे आंख मूंदकर बढ़ने दे रहा है। खाद्य विभाग की कार्रवाई केवल कागज़ी खानापूर्ति बनकर रह गई है और पुलिस की भूमिका भी अनजान बने रहने की तकनीक से आगे नहीं बढ़ती। नतीजा – अवैध रिफिलिंग माफिया के हौसले दिन-ब-दिन और ऊँचे होते जा रहे हैं।
चितौरा गांव, जो NH-44 पर सिविल लाइन थाना क्षेत्र में पड़ता है, आज इस काले धंधे का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। ललितपुर से नागपुर तक के 500–600 किलोमीटर के इस विशाल मार्ग में कहीं भी यह कारोबार इतनी खुलेआम नहीं चलता जितना चितौरा में चलता है। दुकानों के सामने छोटे सिलेंडरों का अंबार दिखना अब आम दृश्य बन चुका है, और ट्रक ड्राइवरों की भीड़ के बीच धड़ल्ले से रिफिलिंग होती रहती है।
आग की चेतावनी जिसे देख कर भी विभाग सो रहा
एक बड़ी घटना ने पूरे इलाके को दहला दिया था अवैध रिफिलिंग से जुड़े माने जाने वाले आशीष जैन और जिनेन्द्र जैन के घर-दुकान में भीषण आग लग गई थी। कई दमकल गाड़ियों ने घंटों मशक्कत कर आग पर काबू पाया। इसके बाद भी न तो प्रशासन जागा, न विभाग। जैसे सब कुछ पहले की तरह चलता रहने की अनुमति किसी ने दे रखी हो।
यह धंधा है खतरनाक भी और गैरकानूनी भी
गैस रिफिलिंग घरेलू सिलेंडर से छोटे सिलेंडर में “टी फिटिंग” लगाकर की जाती है।
5–10 मिनट तक गैस ट्रांसफर चलती है।
एक हल्की चूक-लीक, चिंगारी, या घर्षण पूरा बाजार मिनटों में आग का गोला बना सकती है।
दर्जनों लोडेड ट्रकों, दुकानों और भीड़ के बीच यह खेल जारी रहता है।
एक तरफ जनता को मौत का जोखिम, दूसरी तरफ सरकार को करोड़ों का राजस्व नुकसान दोनों एक साथ चल रहे हैं।
200–300 सिलेंडर रोज़! फिर भी विभाग अनजान?
ग्रामीणों के अनुसार रोज़ाना 200 से 300 छोटे सिलेंडरों में गैस भरी जाती है। यह आंकड़ा अपने-आप में बताता है कि यह काम “छिपकर” नहीं, बल्कि सिस्टम की देख-रेख में हो रहा है।
ग्रामीण लगातार शिकायतें करते हैं, पर हर बार वही पुराना खेल। कई महीने बाद एक कागज़ी कार्रवाई, फिर शांति, और फिर वही अवैध कारोबार शुरू।
ग्रामीणों का आरोप साफ है – महीना चलता है, इसलिए कारोबार भी चलता है।
NH-44 – देश का सबसे लंबा राजमार्ग, सबसे बड़ी लापरवाही
ड्राइवरों को छोटे सिलेंडर चाहिए, दुकानदार अवैध रिफिलिंग कर रहे हैं, और विभाग आंख फेरकर गुजर जाते हैं। इतने संवेदनशील हाईवे पर इस तरह की खतरनाक गतिविधि किसी भी दिन बड़े हादसे को जन्म दे सकती है।
चितौरा भय के साए में, अवैध कारोबारी बेखौफ
ग्रामीण डर में जी रहे हैं, दुकानदार खुलेआम गैस भर रहे हैं, अधिकारी केवल “नाम मात्र” की कार्रवाई कर रहे हैं। अगर यही हाल चलता रहा, तो अगली आग कितनी बड़ी होगी, यह किसी को नहीं पता, पर जिम्मेदार कौन होगा, यह सबको पता है।











