मध्यप्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना है। 2023 का चुनाव बीते ज्यादा समय नहीं हुआ, लेकिन सुरखी विधानसभा में राजनीतिक सरगर्मियाँ अभी से भविष्य की पटकथा लिखती दिखाई दे रही हैं।
2023 की बात करें तो परिस्थितियाँ असाधारण थीं। राजकुमार सिंह धनोरा उस समय जेल में थे और उनकी गैरमौजूदगी में कांग्रेस ने नीरज शर्मा को प्रत्याशी बनाया। धनोरा परिवार और उनके समर्थकों ने पूरी ताकत से सहयोग किया। परिणाम ,मुकाबला कांटे का रहा और नीरज शर्मा भाजपा प्रत्याशी से 2178 वोटों के मामूली अंतर से हार गए।
लेकिन राजनीति स्थिर नहीं रहती। आज हालात बदल चुके हैं।
राजकुमार सिंह धनोरा सक्रिय हैं, क्षेत्र में पकड़ मजबूत मानी जा रही है और समर्थकों का नेटवर्क फिर संगठित होता दिख रहा है। दूसरी ओर नीरज शर्मा भी लगातार मैदान में सक्रिय हैं जिला स्तर के कार्यक्रमों में उपस्थिति, क्षेत्रीय गतिविधियों में भागीदारी और समर्थकों के जरिए अपनी दावेदारी का संकेत।
यानी 2028 दूर है, पर कांग्रेस के भीतर संभावित दो शक्ति केंद्र अभी से आकार लेते दिख रहे हैं। यदि यह संतुलन साधा नहीं गया, तो अंतर्विरोध गहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
और यहीं से कहानी का दूसरा पक्ष शुरू होता है।
प्रदेश सरकार में मंत्री गोविंद सिंह राजपूत , सागर संभाग के सबसे बड़े नेताओं में शुमार, सागर जिले के इकलौते मंत्री और क्षेत्रीय राजनीति का बड़ा नाम। प्रशासनिक अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और राजनीतिक रणनीति में दक्षता उन्हें जिले की राजनीति का केंद्रीय चेहरा बनाती है।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि यदि कांग्रेस अपने संभावित गुटीय समीकरणों को समय रहते संतुलित नहीं करती, तो इसका सीधा लाभ गोविंद सिंह राजपूत को मिल सकता है। वे लंबे समय से क्षेत्रीय समीकरणों को साधने में माहिर माने जाते हैं और विपक्ष की आंतरिक खींचतान अक्सर सत्तापक्ष के लिए अवसर का द्वार खोलती है।
सुरखी की राजनीति 2028 में केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगी। यह टिकट, नेतृत्व और संगठनात्मक एकजुटता की भी परीक्षा होगी।
अभी चुनाव में समय है, पर जो हलचल आज दिख रही है, वही कल का परिणाम तय कर सकती है। सवाल यह है कांग्रेस अपने भीतर संतुलन साध पाएगी, या रणनीति का खेल फिर सत्तापक्ष के पाले में जाएगा?











