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सागर का ‘महा-पाप’.. तीनबत्ती पर डॉ. गौर का अपमान, व्यापारियों की चुप्पी और पत्रकारों की संवेदनहीनता

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सागर का ‘महा-पाप’.. तीनबत्ती पर डॉ. गौर का अपमान, व्यापारियों की चुप्पी और पत्रकारों की संवेदनहीनता

शराबी तो नशे में था, तीनबत्ती का व्यापारी और पत्रकार किस मदहोशी में था?

जिस शहर को डॉ. सर हरिसिंह गौर ने अपनी जिंदगी की गाढ़ी कमाई दान देकर ज्ञान का केंद्र बनाया, उसी सागर के हृदयस्थल तीनबत्ती चौराहे पर रविवार को जो हुआ, वह सिर्फ एक शराबी की हरकत नहीं है। यह घटना उस पूरे समाज के चेहरे पर तमाचा है, जो डॉ. गौर को अपना गौरव बताता है, उनके नाम पर गर्व करता है और फिर उन्हीं की प्रतिमा का अपमान अपनी आंखों के सामने होता देखता रहता है। करीब 10 से 12 फीट ऊपर एक शराबी पहुंचता है, 15 से 20 मिनट तक प्रतिमा के साथ छेड़छाड़ करता है, अपशब्द बोलता है, सिगरेट-बीड़ी सुलगाकर प्रतिमा के चेहरे के पास लगाता है और नीचे खड़ा सागर उसे देखता रहता है। सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि उस शराबी ने ऐसा क्यों किया। सवाल यह है कि उसे ऐसा करने का मौका आखिर मिला कैसे?

तीनबत्ती कोई सुनसान जगह नहीं है। यह शहर का सबसे व्यस्त और प्रमुख चौराहा है। प्रतिमा आसपास से साफ दिखाई देती है। कहा जा रहा है कि घटना करीब 15 से 20 मिनट तक चलती रही। यानी यह कोई क्षणभर की ऐसी घटना नहीं थी जिसे किसी ने देखा ही न हो। नीचे लोग मौजूद थे, आसपास व्यापारी थे, राहगीर थे और मोबाइल कैमरे भी थे। घटना रिकॉर्ड हुई। इसका मतलब साफ है कि लोगों को पता था कि ऊपर क्या हो रहा है। फिर भी सवाल यही है कि वीडियो बनाने के लिए हाथ उठे, लेकिन डॉ. गौर का अपमान रोकने के लिए कितने हाथ उठे?

यहीं से यह घटना उस शराबी से निकलकर समाज के कठघरे में पहुंच जाती है। शराबी नशे में था, इसलिए उसने मर्यादा की सीमा पार की। लेकिन नीचे खड़े लोग किस नशे में थे? क्या वे भी नशे में थे? अगर नहीं, तो फिर उनकी संवेदना कहां थी? क्या आज हम इतने बदल चुके हैं कि किसी गलत घटना को रोकने से पहले मोबाइल निकालना जरूरी समझते हैं? क्या किसी महापुरुष की प्रतिमा के साथ हो रही बेअदबी भी हमारे लिए सिर्फ एक वायरल वीडियो है? अगर यही स्थिति है तो फिर हमें उस शराबी पर गुस्सा करने से पहले अपने भीतर भी झांकना चाहिए।

तीनबत्ती के व्यापारियों से भी यह सवाल है। जिस चौराहे पर छोटी-सी घटना पर दुकानों से लोग निकलकर जमा हो जाते हैं, जहां रोज हजारों लोग आते-जाते हैं, उसी जगह डॉ. गौर की प्रतिमा के साथ 15-20 मिनट तक अभद्रता होती रही और कोई उसे रोकने के लिए आगे नहीं आया। यह सागर के लिए सामान्य स्थिति नहीं हो सकती। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन और अपनी कमाई सागर के भविष्य के लिए लगा दी, उसकी प्रतिमा की गरिमा बचाने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ पुलिस की है? क्या शहर के लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं? क्या व्यापारियों की कोई जिम्मेदारी नहीं? क्या वहां मौजूद हर नागरिक की कोई जिम्मेदारी नहीं?

और इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज सवाल पत्रकारों से है। तीनबत्ती वह जगह है जहां पत्रकार अक्सर बैठते हैं, जहां शहर की खबरों पर चर्चा होती है, जहां से व्यवस्था पर सवाल उठाए जाते हैं। पत्रकार समाज को बताते हैं कि गलत के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए, पुलिस को जिम्मेदारी निभानी चाहिए, प्रशासन को संवेदनशील होना चाहिए और नागरिकों को जागरूक रहना चाहिए। लेकिन अगर उसी पत्रकार की आंखों के सामने डॉ. गौर की प्रतिमा का अपमान हो तो उससे ज्यादा असहज सवाल और क्या हो सकता है?

क्योंकि अगर किसी पत्रकार ने 20 मिनट तक एक शराबी को डॉ. गौर की प्रतिमा के साथ बदसलूकी करते देखा और फिर भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की, तो सवाल सिर्फ उसके पेशे का नहीं, उसके जमीर का है। जिस पत्रकारिता का काम समाज की संवेदना को जगाना है, अगर वही संवेदना सामने घट रही घटना के समय सो जाए तो फिर समाज को जगाने का नैतिक अधिकार कहां बचता है?

यहां सवाल यह भी नहीं है कि हर व्यक्ति शराबी से भिड़ जाए। हर व्यक्ति के लिए अपनी सुरक्षा भी जरूरी है। लेकिन आवाज उठाना, पुलिस को सूचना देना, आसपास के लोगों को एकत्र करना या तत्काल मदद बुलाना। इतना तो कोई भी कर सकता था। इसलिए यह कहना आसान होगा कि “वह तो शराबी था”, लेकिन असली सवाल इससे कहीं ज्यादा कठिन है। शराबी तो नशे में था। उसने डॉ. गौर का अपमान किया। लेकिन तीनबत्ती पर खड़े लोग किस नशे में थे, जिन्होंने उस अपमान को रोकने के बजाय उसे होते देखा?

इस घटना के बाद पुलिस कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। आरोपी के खिलाफ कानून अपना काम करे, यह जरूरी है। लेकिन अगर इस घटना के बाद हम केवल आरोपी को कोसकर आगे बढ़ गए, तो हम उस सबसे बड़े सवाल से बच जाएंगे जो तीनबत्ती ने हमारे सामने खड़ा किया है।

डॉ. गौर का अपमान उस शराबी ने किया था। लेकिन उस अपमान पर शर्मिंदा होने की परीक्षा अब पूरे सागर की है।

✍ Shailendra Singh