एक इंसान की जिंदगी देखिए, शायद आपको ईश्वर का चक्र समझ आ जाए
मनुष्य पैदा होता है और जन्म लेते ही इस संसार से लेना शुरू कर देता है। पहले मां का दूध, फिर पानी, अन्न, कपड़े, घर और धीरे-धीरे जीवन की हर जरूरत। वह बड़ा होता है तो बिजली इस्तेमाल करता है, किताबें खरीदता है, जूते पहनता है, वाहन में चलता है और अपने जीवन को आगे बढ़ाता है। उसे लगता है कि वह सिर्फ अपनी जिंदगी जी रहा है। लेकिन जरा रुककर सोचिए। जिस चीज का वह उपयोग कर रहा है, वह आई कहां से?
एक बल्ब जलाने के लिए स्विच दबाना बहुत आसान है। लेकिन उस बिजली के पीछे कहीं कोयला है, कहीं पानी से चलने वाली टरबाइन है, कहीं सूर्य की ऊर्जा है या कोई दूसरा ऊर्जा स्रोत। यानी आपके कमरे में जलने वाला एक बल्ब भी प्रकृति और मनुष्य के श्रम से बने एक बड़े चक्र का हिस्सा है।
आपने एक रोटी खाई। आपको वह केवल एक रोटी दिखाई दी। लेकिन उसके पीछे मिट्टी थी, बीज था, पानी था, सूर्य था, हवा थी, किसान की मेहनत थी, फिर कटाई, परिवहन, आटा और रसोई तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया थी। एक निवाला आपके शरीर तक पहुंचने से पहले प्रकृति और मनुष्य के कितने हाथों से होकर गुजरता है।
यही बात कपड़ों पर लागू होती है। आपने शर्ट पहनी और आगे बढ़ गए। लेकिन उसके पीछे किसी खेत में पैदा हुआ रेशा, पानी, मशीन, बिजली, श्रमिक और परिवहन जुड़ा हुआ है। जूते पहने तो उनके पीछे भी प्रकृति से निकली सामग्री, ऊर्जा, मशीन और मनुष्य का श्रम है। एक किताब खोली तो उसके पीछे पेड़, पानी, कागज, स्याही, मशीन, बिजली और उसे बनाने वाले अनेक लोग हैं।
हम वस्तु देखते हैं, लेकिन उसके पीछे चल रहा चक्र नहीं देखते।
अब एक गिलास पानी को देखिए। हमें वह सिर्फ पानी दिखाई देता है। लेकिन उसके पीछे बादल, बारिश, नदी, जमीन, जलाशय, ऊर्जा, पाइपलाइन और उसे हमारे घर तक पहुंचाने वाली पूरी व्यवस्था हो सकती है। हम पानी पीकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन प्रकृति के लिए वह पानी भी एक लंबी यात्रा का हिस्सा है।
यही बात एक अन्न के दाने से और आसानी से समझी जा सकती है।
एक दाना मिट्टी में पड़ा। उसमें अंकुर आया। पौधा बना। उसे पानी मिला, सूर्य मिला, हवा मिली। किसान ने उसकी देखभाल की। फसल बनी। दाना हमारे घर आया। हमने उसे खाया। हमारे शरीर ने उससे ऊर्जा ली और उसी ऊर्जा से हमने काम किया।
मिट्टी से पौधे तक, पौधे से अन्न तक, अन्न से मनुष्य तक और मनुष्य से फिर प्रकृति तक एक छोटा-सा दाना भी एक पूरा जीवन-चक्र अपने भीतर लिए चलता है।
और इस चक्र में केवल वही जीव नहीं हैं जिन्हें हम देख सकते हैं। मिट्टी, पानी और हमारे आसपास असंख्य सूक्ष्म जीव मौजूद हैं, जिन्हें हमारी आंखें देख भी नहीं सकतीं। उनमें कुछ जीवन के लिए उपयोगी हैं, कुछ हानिकारक हो सकते हैं और कुछ प्रकृति में पदार्थों के चक्र को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं।
हम किसी चीज को अपनी जरूरत के हिसाब से देखते हैं। प्रकृति उसे पूरे चक्र के हिस्से के रूप में देखती है।
इसीलिए हम भोजन करते हैं तो किसी वनस्पति या जीव से प्राप्त पदार्थ हमारे शरीर का हिस्सा बनता है। शरीर उपयोगी तत्व ग्रहण करता है और बाकी को बाहर निकाल देता है। जिसे हम गंदगी कहते हैं, वह भी शरीर की उसी व्यवस्था का हिस्सा है।
शुद्धता और गंदगी, सृजन और विनाश, जन्म और मृत्यु। ये अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन जीवन के चक्र में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
एक पेड़ पैदा होता है। बढ़ता है। फल देता है। फिर सूखता है और गिर जाता है। हमें लगता है कि उसका जीवन समाप्त हो गया। लेकिन प्रकृति में उसका काम वहीं खत्म नहीं होता। उसके पत्ते मिट्टी में मिलते हैं, उसका पदार्थ दूसरे जीवन के काम आता है और उसी मिट्टी से फिर किसी नए जीवन की शुरुआत हो सकती है।
एक का अंत, दूसरे की शुरुआत बन सकता है।
अब अपने एक कदम को देखिए। आप सड़क पर चले और आपको लगा कि आपने केवल एक कदम उठाया। लेकिन आपके पैरों के नीचे भी जीवन है। आपकी खेती मिट्टी को बदलती है, आपका निर्माण जमीन को बदलता है, आपका पेड़ काटना एक जीवन को समाप्त करता है और पेड़ लगाना दूसरे जीवन की शुरुआत करता है। हमारी छोटी-छोटी गतिविधियां भी प्रकृति में कोई न कोई परिवर्तन पैदा करती हैं।
यानी हम जो कुछ करते हैं, वह इस चक्र को कहीं न कहीं छूता है।
अब इस पूरी व्यवस्था में खुद मनुष्य को देखिए।
वह पैदा होता है। प्रकृति से लेता है। परिवार से लेता है। समाज से लेता है। शिक्षा लेता है। भोजन लेता है। ऊर्जा लेता है। दूसरों के श्रम से लाभ लेता है। फिर बड़ा होकर स्वयं कुछ देने लगता है।
कोई किसान बनता है, कोई मजदूर, कोई शिक्षक, कोई वैज्ञानिक, कोई अधिकारी, कोई व्यापारी, कोई सिपाही, कोई कर्मचारी। हमें लगता है कि ये केवल इंसानों द्वारा बनाई गई व्यवस्थाएं हैं। लेकिन जरा सोचिए, अलग-अलग काम करने की इतनी क्षमताएं मनुष्य के भीतर आई कहां से?
किसी को विज्ञान की बुद्धि मिली, किसी को नेतृत्व की, किसी को प्रशासन की, किसी को खेती की, किसी को हाथ से काम करने की अद्भुत क्षमता। किसी को धैर्य मिला, किसी को कल्पना, किसी को मेहनत और किसी को समस्या हल करने की क्षमता।
किसी एक व्यक्ति को सब कुछ नहीं मिला।
शायद इसलिए कि किसी एक व्यक्ति को सम्पूर्ण नहीं बनाया गया।
वैज्ञानिक को भी किसान की जरूरत है। अधिकारी को कर्मचारी की। शहर को गांव की। व्यापारी को ग्राहक की। डॉक्टर को मरीज की। समाज को सफाई करने वाले की। और हर व्यक्ति को भोजन, पानी, ऊर्जा और प्रकृति की जरूरत है।
हम अलग-अलग हैं, लेकिन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
यहीं से ईश्वर के उस चक्र की सबसे बारीक बात समझ आती है।
मनुष्य को बुद्धि दी गई, लेकिन सम्पूर्ण बुद्धि नहीं। उसे शक्ति दी गई, लेकिन सम्पूर्ण शक्ति नहीं। उसे स्वतंत्रता दी गई, लेकिन हर परिस्थिति को अपने अनुसार बदल देने की स्वतंत्रता नहीं।
आप धन कमा सकते हैं, लेकिन समय नहीं खरीद सकते।
आप विज्ञान को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन मृत्यु को रोक नहीं सकते।
आप किसी को समझा सकते हैं, लेकिन उसके मन को अपनी इच्छा से बदल नहीं सकते।
आप अपने बच्चे को सही रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन उसके हर निर्णय को अपने हाथ में नहीं रख सकते।
आप किसी मित्र को गलत रास्ते से रोक सकते हैं, लेकिन उसके भीतर परिवर्तन पैदा करना आपके हाथ में नहीं है।
क्षमता के साथ सीमा भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है।
शायद इसी कारण मनुष्य को कभी पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती। वह एक लक्ष्य हासिल करता है तो दूसरा सामने आ जाता है। एक सवाल का जवाब मिलता है तो कई नए सवाल पैदा हो जाते हैं। वह आगे बढ़ता है तो जीवन उसके सामने नई जिम्मेदारी रख देता है।
परिवार, रिश्ते, बच्चे, समाज, समय और परिस्थितियां—ये सब कई बार उसकी गति को रोकते हैं, लेकिन शायद यही रोकना भी जीवन के चक्र का हिस्सा है।
यदि मनुष्य अपनी बुद्धि की अंतिम सीमा तक पहुंच जाए, यदि उसे हर प्रश्न का उत्तर मिल जाए, यदि वह हर परिणाम पहले से जान ले और हर परिस्थिति को नियंत्रित कर सके, तो फिर उसके लिए सीखने, खोजने, संघर्ष करने और आगे बढ़ने को क्या बचेगा?
शायद इसलिए मनुष्य को क्षमता दी गई है, लेकिन सम्पूर्णता नहीं।
और यही बात हमें अपने जीवन में भी स्वीकार करनी चाहिए।
हम किसी को सही रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन उसकी पूरी जिंदगी अपने हाथ में नहीं ले सकते। हम किसी को नशा छोड़ने के लिए समझा सकते हैं, गलत काम से रोक सकते हैं, मेहनत करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं—लेकिन अंतिम निर्णय उसका ही होगा।
कई बार एक पिता अपनी पूरी जिंदगी संतान को समझाता है और फिर भी संतान अपनी राह चुनती है। एक भाई अपने भाई को नहीं बदल पाता। एक मित्र अपने मित्र को नहीं बदल पाता।
इसका अर्थ यह नहीं कि समझाने वाला असफल हो गया।
कई बार हमारी भूमिका केवल रास्ता दिखाने तक होती है। आगे चलना दूसरे का काम होता है।
अब अंत में वापस उसी मनुष्य के पास आइए, जिससे हमने शुरुआत की थी।
वह पैदा हुआ।
उसने प्रकृति से लिया।
भोजन किया।
पानी पिया।
बिजली इस्तेमाल की।
कपड़े पहने।
जूते पहने।
किताबें पढ़ीं।
दूसरों के श्रम से अपना जीवन बनाया।
फिर उसने भी मेहनत की, कुछ बनाया, कुछ सिखाया, बच्चों को आगे बढ़ाया और समाज को कुछ दिया।
और एक दिन उसका जीवन समाप्त हो गया।
लेकिन प्रकृति नहीं रुकी।
उसके बाद भी सूरज निकला।
फसलें उगीं।
पानी बहा।
बिजली बनी।
बच्चे पैदा हुए।
नई पीढ़ी आई।
और वही चक्र आगे चलता रहा।
मनुष्य चला गया, लेकिन जीवन चलता रहा।
शायद यही सबसे बड़ी बात है जिसे हमें समझना चाहिए।
हम इस संसार को चला नहीं रहे।
हम स्वयं उस विशाल व्यवस्था का हिस्सा हैं।
हम प्रकृति से आए हैं, प्रकृति से लेते हैं, उसी के सहारे जीते हैं और अंत में उसी में लौट जाते हैं।
इसलिए अपनी बुद्धि पर विश्वास रखिए, लेकिन अहंकार मत कीजिए।
अपनी क्षमता का उपयोग कीजिए, लेकिन अपनी सीमा मत भूलिए।
दूसरों को सही रास्ता दिखाइए, लेकिन उन्हें अपने अनुसार बनाने की जिद मत कीजिए।
प्रकृति का उपयोग कीजिए, लेकिन उसे अपना गुलाम मत समझिए।
और जीवन को पूरी तरह समझने की कोशिश जरूर कीजिए, लेकिन यह स्वीकार करके कि इस पूरी व्यवस्था का अंतिम रहस्य शायद हमारी समझ से हमेशा बड़ा रहेगा।
क्योंकि हम ईश्वर के चक्र को चला नहीं रहे..
हम स्वयं उसी चक्र का एक हिस्सा हैं।






