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झाड़-फूंक, गड़ा और देशी पुड़िया… कहीं अगली लाश आपके घर से न उठे!

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झाड़-फूंक, गड़ा और देशी पुड़िया… कहीं अगली लाश आपके घर से न उठे!

बीमारी से ज्यादा खतरनाक है उसका गलत इलाज… क्योंकि जब सच्चाई समझ आती है, तब तक डॉक्टर भी कह देता है, अब बहुत देर हो चुकी है।

यह बात मैं किसी किताब में पढ़कर नहीं लिख रहा हूं।

अपने आसपास देखी-सुनी घटनाओं ने मजबूर किया है कि यह बात लिखूं।

कल ही एक व्यक्ति की बात सुनी। उसे पीलिया हो गया था।

डॉक्टर को दिखाने और सही दवा लेने के बजाय उसने बीमारी को झड़वाया, गड़ा बंधवाया और निश्चिंत हो गया कि अब वह ठीक हो जाएगा।

जब पीलिया ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया, तब अस्पताल पहुंचा।

डॉक्टर ने जांच की और कहा..

अब बहुत देर हो चुकी है।

दो दिन बाद उसकी मौत हो गई।

सोचिए…

अगर वह शुरुआत में ही डॉक्टर के पास चला जाता तो?

शायद आज वह हमारे बीच होता।

एक ऐसे ही व्यक्ति के बारे में सुना, जिसे कैंसर है।

कैंसर का नाम सुनते ही परिवार को सबसे पहले क्या करना चाहिए?

अच्छे डॉक्टर से जांच और इलाज।

लेकिन यहां कहानी दूसरी है।

कल ही उनके रिश्तेदार उन्हें देखने गए थे। उन्होंने बताया कि वह एक जगह देशी दवाई ले रहे हैं और दूसरी जगह झड़वाने जा रहे हैं।

अब इनको क्या कहें?

कैंसर को आज हर स्थिति में लाइलाज बीमारी मानना सही नहीं है।

कई कैंसर का इलाज संभव है।

लेकिन एक बात बहुत महत्वपूर्ण है..

कैंसर में समय निकल गया तो इलाज की संभावना भी प्रभावित हो सकती है।

फिर हम बीमारी का इलाज कराने के बजाय उसे झड़वाने और देशी पुड़िया के भरोसे क्यों छोड़ देते हैं?

अब एक और घटना सुनिए।

मेरे एक परिचित की मां के पैर की नस की समस्या चल रही है।

नागपुर और भोपाल में इलाज कराया गया।

ऐसी समस्या में पूरी तरह आराम आने में समय लग सकता है।

इसी बीच उन्हें किसी वैद्य की जानकारी मिली।

अब वह करीब 200 किलोमीटर दूर उसके पास इलाज कराने जा रही हैं।

मैं यह सुनकर परेशान हूं।

क्योंकि मुझे अंदाजा है कि वह वैद्य दर्द कम करने के लिए देशी पुड़िया में पेनकिलर जैसी दवाओं की भारी मात्रा मिलाकर दे सकता है।

और यहीं से एक दूसरी मुसीबत शुरू होती है।

दर्द खत्म हो गया, तो इसका मतलब बीमारी खत्म हो गई—यह जरूरी नहीं है।

दर्द की दवा ज्यादा मात्रा में और लंबे समय तक लेना भी शरीर के लिए घातक हो सकता है।

मेरे ऐसे ही एक परिचित नस के दर्द में लगातार पेनकिलर की गोलियां खाते रहे।

बाद में किडनी में गंभीर कमी निकली।

भाग्य से बड़ा ऑपरेशन हुआ।

लेकिन उनकी जान नहीं बच पाई।

इसलिए मैं उस मां के लिए भी डर रहा हूं जो 200 किलोमीटर दूर जा रही हैं।

यह समस्या सिर्फ अनपढ़ या अशिक्षित लोगों की नहीं है।

मैंने जिन घटनाओं का जिक्र किया है, उनमें अच्छे-खासे पढ़े-लिखे और समझदार लोग भी शामिल हैं।

इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस जाल की पहुंच समाज के हर वर्ग तक है।

जितने लोग अस्पतालों में इलाज कराने जाते दिखाई देते हैं, उतने ही लोग कहीं न कहीं इन बाबाओं, वैद्यों और हकीमों के चक्कर में भी जाते हैं।

कोई बीमारी लेकर जाता है।

कोई उम्मीद लेकर जाता है।

और कई बार इसी उम्मीद का फायदा उठाया जाता है।

अब जिम्मेदारी सिर्फ लोगों की नहीं, सिस्टम की भी है।

जिस तरह लोगों को जागरूक करना जरूरी है, उसी तरह ऐसे फर्जी इलाज और लोगों की मजबूरी का फायदा उठाकर कारोबार करने वालों की निगरानी और धरपकड़ भी बेहद जरूरी है।

जहां कोई व्यक्ति बिना उचित योग्यता के गंभीर बीमारियों का इलाज करने का दावा कर रहा है, वहां संबंधित विभागों को जांच करनी चाहिए।

अगर कोई झूठे दावे करके लोगों को भ्रमित कर रहा है या खतरनाक तरीके से दवाइयां दे रहा है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

क्योंकि यह सिर्फ अंधविश्वास का मामला नहीं है।

किसी की जिंदगी का सवाल है।

एक अच्छा डॉक्टर सामने वाले की जांच रिपोर्ट देखता है।

उसकी उम्र देखता है।

उसके शरीर की स्थिति देखता है।

वह कौन-सी दवाइयां ले रहा है, यह देखता है।

फिर दवा की सही मात्रा तय करता है।

क्योंकि हर व्यक्ति का शरीर अलग है।

हर बीमारी अलग है।

और हर दवा हर व्यक्ति के लिए सही नहीं हो सकती।

लेकिन हम क्या करते हैं?

किसी ने कह दिया—

वहां चले जाओ, मेरी जान-पहचान का है। उसकी पुड़िया से बहुत लोग ठीक हुए हैं।

हम 100-200 किलोमीटर जाने को तैयार हो जाते हैं।

किसी ने कह दिया…

झड़वा लो, गड़ा बंधवा लो, ठीक हो जाओगे।

हम अस्पताल छोड़कर उसके पीछे चल पड़ते हैं।

और जब हालत बिगड़ती है…

तब उसी अस्पताल पहुंचते हैं जिसे शुरुआत में छोड़ दिया था।

तब डॉक्टर से उम्मीद करते हैं कि वह सब ठीक कर देगा।

लेकिन कभी-कभी डॉक्टर के पास भी सिर्फ एक जवाब बचता है—

अब बहुत देर हो चुकी है।

मेरा यह सब लिखने का उद्देश्य किसी व्यक्ति, वैद्य या किसी चिकित्सा पद्धति को बदनाम करना नहीं है।

मेरा उद्देश्य सिर्फ एक है. आप और आपका परिवार ऐसी गलती न करे।

बीमारी हो तो पहले सही जांच कराइए।

योग्य डॉक्टर से सलाह लीजिए।

गंभीर बीमारी को झाड़-फूंक के भरोसे मत छोड़िए।

किसी के कहने पर दवा की पुड़िया मत खाइए।

दर्द की दवा भी अपनी मर्जी से लगातार मत खाते रहिए।

और सबसे बड़ी बात..

किसी के बहकावे में आकर इलाज में देरी मत कीजिए।

क्योंकि बीमारी से लड़ने का समय निकल गया तो फिर पछताने का भी समय नहीं मिलता।

अंधविश्वास में लगाया गया एक दिन कभी-कभी जिंदगी के कई साल छीन सकता है।

आपको यह बात कड़वी लगे तो लगे…

लेकिन किसी एक व्यक्ति की जिंदगी अगर यह पढ़कर बच गई,

तो समझिए यह पोस्ट लिखना सफल हो गया।

जागरूक बनिए। सवाल पूछिए। जांच कराइए। सही इलाज कराइए।

क्योंकि…

झाड़-फूंक, गड़ा और देशी पुड़िया के भरोसे जिंदगी मत छोड़िए।

जब आंख खुलती है… तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।