राहुल गांधी कहते हैं ‘डरो मत’… लेकिन पत्रकार पूछ रहा है- विज्ञापन बंद हुआ तो घर कैसे चलेगा?
..सागर से दिल्ली तक सरकारी विज्ञापन, मीडिया और विपक्ष की भूमिका पर उठे ऐसे सवाल, जिनका जवाब हर पत्रकार और पाठक को जानना चाहिए।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद के बाहर मीडिया को नसीहत दी, डरो मत। उन्होंने कहा कि जब पूरे देश में छात्र नहीं डर रहे हैं तो मीडिया को भी नहीं डरना चाहिए।
बात सुनने में बेहद लोकतांत्रिक और साहस देने वाली है। लेकिन पत्रकारिता जमीन पर भाषणों से नहीं चलती। पत्रकारिता का एक कठोर सच है। डर कई बार सत्ता की धमकी से नहीं, बल्कि जेब से पैदा होता है।
और जब मीडिया की जेब में आने वाला पैसा किसी सरकार के हाथ में हो, तब पत्रकार को सिर्फ यह कहना कि डरो मत, पर्याप्त नहीं है।
उसे पहले यह भरोसा देना होगा। सच लिखोगे तो तुम्हें आर्थिक रूप से अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।
सागर से समझिए सरकारी विज्ञापन का खेल
मध्यप्रदेश के सागर जिले से सामने आई जानकारी इस पूरे सवाल को समझने के लिए काफी है।
सागर के डिजिटल मीडिया से जुड़े कुछ पत्रकारों को भोपाल जनसंपर्क विभाग में बुलाया गया। वहां उनसे कहा गया कि मध्यप्रदेश शासन की योजनाओं और मुख्यमंत्री के कामकाज का जमकर प्रचार-प्रसार करें। इसके बाद कुछ सप्ताह तक उनके काम की मॉनिटरिंग की जाएगी और फिर विज्ञापन देने पर विचार किया जाएगा।
इसके बाद हुआ क्या?
सागर के व्हाट्सऐप ग्रुप, सोशल मीडिया के दूसरे प्लेटफॉर्म और संबंधित वेबसाइटों पर सरकार की योजनाओं और मुख्यमंत्री के प्रचार-प्रसार की बाढ़ आ गई।
अब जानकारी यह है कि इन प्लेटफॉर्मों को 20 से 25 हजार रुपये प्रतिमाह तक के सरकारी विज्ञापन जारी होना शुरू हो गए हैं।
यानी सवाल सीधा है
पहले प्रचार करो, फिर मॉनिटरिंग होगी और उसके बाद विज्ञापन मिलेगा, क्या यही पत्रकारिता की आर्थिक स्वतंत्रता है?
अगर सरकारी विज्ञापन का आधार पत्रकारिता की गुणवत्ता, पाठक संख्या, वास्तविक पहुंच और जनहित की खबरें नहीं बल्कि सरकार का प्रचार है, तो फिर सरकार और मीडिया के बीच संबंध पत्रकारिता का नहीं, निर्भरता का संबंध बन जाता है।
यह सिर्फ बड़े मीडिया संस्थान, डिजिटल मीडिया की कहानी नहीं
सागर में जिला स्तर के छोटे अखबारों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है।
ऐसे कई संस्थान हैं जिनकी आर्थिक रीढ़ सरकारी विज्ञापन है। विज्ञापन आता है तो संस्थान चलता है। विज्ञापन रुकता है तो कर्मचारियों का वेतन, कार्यालय का खर्च और अखबार निकालने तक पर संकट खड़ा हो जाता है।
और यहीं से वह अदृश्य डर पैदा होता है, जिसका जिक्र राहुल गांधी कर रहे हैं।
सरकार के खिलाफ ज्यादा मत लिखो।
खबर ठीक है, लेकिन इतनी तीखी मत करो।
विज्ञापन बंद हो गया तो क्या करेंगे?
ये वाक्य किसी सरकारी आदेश में लिखे हों, यह जरूरी नहीं। कई बार व्यवस्था खुद पत्रकार को यह भाषा सिखा देती है।
सागर में एक और उदाहरण
सागर में ही एक ऐसा अखबार भी है जिसे कांग्रेस और एक मौजूदा भाजपा विधायक से जुड़ा हुआ माना जाता है। यह अखबार भी लंबे समय से इसी सरकार की योजनाओं और मुख्यमंत्री के कामकाज का महिमामंडन करता रहा है और उसके लिए सरकारी विज्ञापन जारी होते रहे हैं।
लेकिन जब इसी अखबार ने सरकार के खिलाफ एक खबर प्रकाशित की तो उसके सरकारी विज्ञापन लंबे समय से बंद होने की बात सामने आई।
अब वही अखबार बंद विज्ञापनों को दोबारा शुरू कराने के लिए मिन्नतें करता घूम रहा है।
अगर यह स्थिति किसी एक अखबार की है, तो सवाल उस अखबार से ज्यादा व्यवस्था से है।
क्या सरकारी विज्ञापन सरकार की तारीफ का इनाम है और सरकार की आलोचना की सजा?
अगर जवाब ‘नहीं’ है तो फिर विज्ञापन रोकने और जारी करने के पूरे आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
लेकिन राहुल गांधी से भी सवाल है
मीडिया संस्थानों को घेरना बहुत आसान है।
किसी पत्रकार को सत्ता का समर्थक बताना आसान है।
किसी चैनल को ‘गोदी मीडिया’ कहना आसान है।
लेकिन विपक्ष ने कभी उस पत्रकार की पीड़ा को कितनी गंभीरता से उठाया है जो सरकार के खिलाफ लगातार खबरें करता है और इसके बाद उसका विज्ञापन बंद हो जाता है?
क्या कांग्रेस ने कभी यह सवाल उठाया कि ऐसे पत्रकार की जीविका कैसे चलेगी?
क्या विपक्ष ने कभी ऐसी व्यवस्था बनाने की बात की कि जो पत्रकार सरकार और जनता से जुड़े मुद्दों पर सत्ता को लगातार घेरे, उसकी आर्थिक स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे?
सागर के कांग्रेस नेताओं से भी सवाल
सवाल सिर्फ दिल्ली में बैठे राहुल गांधी से नहीं है।
सागर में कांग्रेस से जुड़े व्यापारी हैं। बड़े नेता हैं। कॉलोनाइजर हैं। प्रभावशाली लोग हैं।
उनसे सीधा सवाल है
जो पत्रकार सत्ता से सीधा सवाल करता है, क्या आपने कभी खुद उसके अखबार या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन दिया?
क्या कभी किसी कांग्रेस नेता या कांग्रेस समर्थक बड़े कारोबारी ने यह सोचा कि जिस पत्रकार को सरकार के विज्ञापन का नुकसान उठाना पड़ रहा है, उसके संस्थान को वैकल्पिक विज्ञापन देकर उसकी पत्रकारिता को जिंदा रखा जाए?
अगर कोई पत्रकार सरकार की गलत नीतियों को लेकर लगातार सवाल करता है, जनता के मुद्दे उठाता है और इसी वजह से उसकी आर्थिक मुश्किल बढ़ती है तो
क्या विपक्ष ने कभी उसकी सुरक्षा और जीविका की चिंता की?
फिर पत्रकार डरे क्यों नहीं?
यही असली सवाल है।
एक पत्रकार के सामने दो रास्ते हैं।
एक तरफ सरकार की योजनाओं और मुख्यमंत्री के कामकाज का लगातार प्रचार करने पर मिलने वाला विज्ञापन है।
दूसरी तरफ सरकार से सवाल करने पर विज्ञापन बंद होने का डर।
अब उससे कहा जाता है
डरो मत।
मगर पत्रकार पूछता है
अगर विज्ञापन बंद हुआ तो मेरे कर्मचारियों की तनख्वाह कौन देगा?
ऑफिस का किराया कौन देगा?
वेबसाइट का सर्वर कौन चलाएगा?
मेरे परिवार का खर्च कौन उठाएगा?
यही वह जगह है जहां राजनीतिक भाषण और पत्रकारिता की जमीन अलग हो जाती है।
मीडिया की आजादी का मतलब सिर्फ सरकार से सवाल करना नहीं
मीडिया की आजादी का मतलब यह भी है कि सरकार किसी मीडिया संस्थान को पसंद करे या न करे, विज्ञापन के नियम समान रहें।
जिस अखबार ने सरकार की तारीफ की, उसे भी नियम के मुताबिक विज्ञापन मिले।
जिसने सरकार की आलोचना की, उसे भी उसी नियम के मुताबिक विज्ञापन मिले।
जिस डिजिटल प्लेटफॉर्म ने मुख्यमंत्री की योजना की खबर लगाई, उसे भी वही मापदंड मिले।
और जिसने उसी योजना में भ्रष्टाचार या कमी की खबर की, उसे भी उसी मापदंड से देखा जाए।
सरकार को पत्रकार की खबर पसंद है या नहीं। यह विज्ञापन का आधार नहीं होना चाहिए।
विपक्ष को अब सिर्फ बयान नहीं, व्यवस्था पर बात करनी होगी
राहुल गांधी अगर वास्तव में चाहते हैं कि मीडिया निडर होकर काम करे तो उन्हें एक कदम आगे जाना होगा।
संसद में सवाल उठाना होगा।
सरकारी विज्ञापन की नीति पर बहस करनी होगी।
विज्ञापन आवंटन के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग करनी होगी।
यह तय कराने की लड़ाई लड़नी होगी कि सरकारी विज्ञापन सत्ता की कृपा नहीं, पारदर्शी नियमों के तहत मिलने वाला सार्वजनिक संसाधन हो।
और सबसे जरूरी
विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता के खिलाफ खड़े पत्रकार के साथ वह खुद क्या करेगा।
क्योंकि पत्रकार को सरकार से बचाने की बात करना आसान है।
लेकिन जब उसकी आमदनी चली जाए, तब उसके साथ खड़ा होना असली परीक्षा है।
सागर का सवाल दिल्ली के लिए
सागर कोई अकेला शहर नहीं है।
देश के हजारों छोटे शहरों और जिलों में छोटे अखबार और डिजिटल मीडिया संस्थान इसी आर्थिक ढांचे में काम करते हैं।
उनके पास बड़े कॉरपोरेट विज्ञापन नहीं हैं।
उनके पास करोड़ों की पूंजी नहीं है।
उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनकी खबर और उनके पाठक हैं।
लेकिन अगर सरकारी विज्ञापन उनके लिए जीवनरेखा है, तो उस जीवनरेखा पर सत्ता का नियंत्रण पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौती है।
इसलिए राहुल गांधी के “डरो मत” का जवाब पत्रकारिता की जमीन से एक ही है
पहले ऐसा सिस्टम बनाइए जिसमें पत्रकार सच बोलने के बाद भूखा न रहे।
पहले ऐसी व्यवस्था बनाइए जिसमें सरकार से सवाल पूछना आर्थिक आत्महत्या न बने।
पहले यह सुनिश्चित कीजिए कि विज्ञापन सरकार की तारीफ का इनाम और आलोचना की सजा न बन सके।
क्योंकि पत्रकार को सिर्फ बोलने की आजादी नहीं चाहिए।
उसे जीने की आजादी भी चाहिए।
और यही वह सवाल है जिसे सत्ता और विपक्ष, दोनों को सुनना होगा।
मीडिया को आजाद करना है तो पहले विज्ञापन को आजाद करो।
‘डरो मत’ कहने से पहले पत्रकार से यह कहने का इंतजाम करो- ‘सच लिखो, हम तुम्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे।’
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