लोक-आस्था का महासंगम.. गौ-रक्षक भगवान वीर पाबूजी महाराज के जन्मोत्सव पर उमड़ा आस्था का सैलाब, विभिन्न राज्यों से पहुँचे लाखों श्रद्धालु
मारवाड़ की पावन धरा के ऐतिहासिक गाँव कोलू मण्ड में आज लोक-देवता वीर भगवान पाबूजी महाराज के अवतरण दिवस पर आस्था का एक अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। भाद्रपद शुक्ल नवमी के इस पावन अवसर पर अलसुबह से ही मंदिर परिसर ‘जय पाबूजी री’ के जयकारों से गुंजायमान है। हाथ में भाला लिए और बाईं ओर झुकी पगड़ी के साथ अश्व पर सवार भगवान पाबूजी महाराज की दिव्य प्रतिमा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की किलोमीटर लंबी कतारें लगी हुई हैं।
संक्षिप्त परिचय: वचनों के लिए फेरे बीच में छोड़ने वाले देवता…
इतिहासकारों और लोक-मान्यताओं के अनुसार, भगवान पाबूजी महाराज का जन्म 1239 ईस्वी में धांधल जी राठौड़ के यहाँ हुआ था। उन्हें भगवान श्री राम के अनुज भगवान लक्ष्मण जी का अवतार माना जाता है। श्री पाबूजी का जीवन त्याग और गौ-रक्षा की अमर मिसाल है। जब वे अमरकोट की राजकुमारी के साथ विवाह के फेरे ले रहे थे, तभी देवल चारणी की गायों को जींदराव खींची से छुड़ाने के लिए उन्होंने साढ़े तीन फेरों के बाद ही गठबंधन तोड़ दिया। देचू गाँव के पास भीषण युद्ध में गायों की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। तब से वे लोक-देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
देश के अलग-अलग प्रदेशों से जुड़े श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास…
भगवान श्री पाबूजी महाराज के प्रति आस्था केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में उनका गहरा सामाजिक और धार्मिक प्रभाव है
राजस्थान और गुजरात (रेबारी व राईका समाज) यहाँ के पशुपालक और रेबारी समाज के लोग भगवान पाबूजी महाराज को अपना मुख्य आराध्य मानते हैं। वे उन्हें ‘ऊंटों के देवता’ के रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि ऊंट के बीमार होने पर भगवान पाबूजी के नाम का ताँगा (धागा) बाँधने और ‘पाबूजी की फड़’ का वाचन कराने से मवेशी तुरंत ठीक हो जाते हैं।
मध्य प्रदेश और पंजाब के श्रद्धालु: मालवा अंचल (मध्य प्रदेश) और पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग अपनी मन्नतें लेकर यहाँ आते हैं। विशेषकर प्लेग और अन्य संक्रामक बीमारियों से रक्षण के लिए लोग पाबूजी महाराज की भभूत को चमत्कारी मानते हैं।
थोरी और नायक समाज की भक्ति: थोरी जाति के लोग पाबूजी महाराज को अपना रक्षक और भाई मानते हैं, क्योंकि पाबूजी ने अपने जीवनकाल में उन्हें आश्रय दिया था। इस समाज के भोपे रावणहत्था वाद्य यंत्र के साथ रात भर ‘पाबूजी की फड़’ (कपड़े पर उकेरी सचित्र गाथा) गाकर उनकी वीरता को जीवंत रखते हैं।
चैत्र और भादवा के मेले: सांस्कृतिक धरोहर का प्रदर्शन
यूँ तो कोलू मण्ड में प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को मुख्य विशाल मेला भरता है, लेकिन भाद्रपद शुक्ल नवमी (आज) को भी यहाँ लक्खी मेले जैसा माहौल रहता है। मेले के दौरान पूरा क्षेत्र रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा से सज जाता है। रातिजोगा (रात्रि जागरण) में ‘माठ’ वाद्य यंत्र के साथ भगवान पाबूजी के वीर रस से ओत-प्रोत ‘पवाड़े’ (भजन) गाए जाते हैं, जो आने वाले भक्तों में एक नई ऊर्जा का संचार करते हैं। भक्तगण मंदिर में चांदी के छत्र, ध्वजा और पारंपरिक प्रसाद चढ़ाकर ढोक लगाते हैं।
प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट की चाक-चौबंद व्यवस्थाएं
मीडिया को जानकारी देते हुए स्थानीय प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने बताया कि भारी भीड़ को देखते हुए व्यापक इंतजाम किए गए हैं
आवास व ठहरने की उत्तम व्यवस्था: मंदिर परिसर के निकट स्थित विशाल ‘भगवान श्री पाबूजी महाराज धर्मशाला’ और विभिन्न सामाजिक धर्मशालाओं में यात्रियों के लिए वातानुकूलित (AC) और गैर-वातानुकूलित कमरों की मुस्तैद व्यवस्था है।
निःशुल्क अन्नक्षेत्र (भजनशाला): दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर ट्रस्ट की ओर से चौबीसों घंटे शुद्ध सात्विक भोजन और लंगर (प्रसादी) का सुचारू संचालन किया जा रहा है।
सुरक्षा एवं यातायात नियंत्रण: राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-11) से मंदिर की ओर आने वाले रास्तों पर फलौदी जिला पुलिस द्वारा भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया है। वाहनों के लिए बड़े पार्किंग स्थल बनाए गए हैं और सीसीटीवी कैमरों से पूरे मेला परिसर की निगरानी की जा रही है।
पेनोरमा और पर्यटन: दर्शन के साथ-साथ यहाँ आने वाले लोग राजस्थान सरकार द्वारा निर्मित भव्य ‘श्री पाबूजी पेनोरमा’ को भी देख रहे हैं, जहाँ भगवान पाबूजी के संपूर्ण जीवन को चित्रों और मूर्तियों के माध्यम से सहेजा गया है।
आज का यह पावन उत्सव यह साबित करता है कि सदियां बीत जाने के बाद भी त्याग, वीरता और गौ-सेवा के आदर्श जन-जन के दिलों में आज भी उतने ही जीवंत और प्रासंगिक हैं।






