कश्मीर से कन्याकुमारी को जोड़ने वाले NH-44 के किनारे करोड़ों की जमीन पर ढाबा–दुकान–मकानों की कॉलोनी
सागर जिले के चितौरा टोल प्लाज़ा (NH-44) के दोनों ओर राजस्व-वन-टोल प्लाज़ा की 25 एकड़ से ज्यादा सरकारी भूमि पर वर्षों से चल रहा कब्जा अब प्रशासन की नाकामी की खुली मिसाल बन चुका है।
हमारे द्वारा इस अवैध कब्जे का मामला उजागर किए जाने के बाद प्रशासन ने कब्जाधारियों को नोटिस तो जारी कर दिए, लेकिन महीने गुजर जाने के बाद भी एक इंच जमीन खाली नहीं कराई गई।
नोटिस फाइलों में और कब्जा जमीनी हकीकत में जस का तस है।
किस रूट पर है ये जमीन?
यह वही NH-44 है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को जोड़ने वाला सबसे लंबा हाईवे है। टोल प्लाज़ा के ठीक बगल की यह जमीन फोर-लेन के किनारे होने के कारण करोड़ों रुपये मूल्य की मानी जाती है।
यही वजह है कि यहां का हर टुकड़ा सोने की खान की तरह देखा जाता है और यही भू-लालच इस पूरे कब्जा तंत्र को चला रहा है।
25+ एकड़ सरकारी भूमि पर बना अवैध कमर्शियल टाउन
चितौरा (हल्का 56) और रैपुरा (हल्का 57) में सरकारी जमीन पर:
10 बड़े पक्के ढाबे
25–30 दुकानें
कई स्लैब वाले मकान
बीम कॉलम वाले संरचनाएं
तारफेंसिंग से घिरे भूखंड
बना दिए गए हैं।
इन ढाबों से 30–50 हजार और दुकानों से 4-5 हजार महीना किराया वसूला जा रहा है।
आय का यह पूरा स्रोत सरकारी जमीन पर खड़ा है।
नशे के व्यापार का बड़ा ठिकाना भी बना यह क्षेत्र
NH-44 का यह 2 किमी का इलाका ललितपुर-नागपुर रूट में सबसे बड़े अनौपचारिक कमर्शियल पॉकेट के रूप में उभर चुका है।
ट्रक चालकों की आवाजाही और रातभर ठहराव के कारण यहां
स्नानागार,
ढाबे,
मरम्मत शॉप के नाम पर कई दुकाने बनीं, और धीरे-धीरे यह क्षेत्र नशे के व्यापार का अड्डा माना जाने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय राजमार्ग के 500 मीटर दायरे में शराब दुकानें प्रतिबंधित होने के बावजूद यहां यह धंधा बरसों से फल-फूल रहा है।
आबकारी, थाना क्षेत्र और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत पर उंगलियां उठ रही हैं।
मुख्यमंत्री के निर्देश भी धरे रह गए, जिला प्रशासन की असहाय छवि
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने
कानून व्यवस्था ठीक न करने पर अफसर बदलने,
नशे की सप्लाई चेन तोड़ने,
सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने
का फ्री हैंड दिया था।
कुछ जगहों पर दिखावटी अभियान भी चला, लेकिन चितौरा-रैपुरा में स्थिति जस की तस।
अब भी
नोटिस जारी,
फाइलें धूल खा रहीं,
अतिक्रमणकारियों के मंसूबे और मजबूत
हैं।
कौन कितनी जमीन पर काबिज? सबसे बड़ा नेटवर्क
नीचे दोनों मौजों के प्रमुख कब्जाधारियों का संक्षिप्त ब्यौरा:
रैपुरा मौजा
भोले अहिरवार – 4 एकड़, पक्का मकान + ढाबा + दुकानें
मलखान यादव, दौलत यादव – 4 ढाबे, 4 दुकानें; 3+ एकड़
हरिसिंह – 4 दुकानें, पक्का मकान; 2.5 एकड़
झल्लू अहिरवार – 5 दुकानें किराये पर; 3 पक्के मकान; लगभग 4 एकड़
चितौरा मौजा
महेश अहिरवार – ढाबा + दुकान; 2.5 एकड़
नन्ने बाई व हनमत – 2+ एकड़
दलपत चौधरी – 2.5 एकड़
खनजू चौधरी, जय सिंह लोधी, दयाराम पटेल, लीला चौधरी – प्रत्येक 1 एकड़
मुन्ना अहिरवार – 1 एकड़
सभी मिलकर 10 ढाबे, 25–30 दुकानें, और दर्जनों पक्के मकान संचालित कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल
जब नोटिस जारी हो चुके हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
कितने महीने और गुजरेंगे?
कश्मीर से कन्याकुमारी हाईवे के किनारे इतनी बड़ी सरकारी भूमि पर कब्जा आखिर किसके संरक्षण में संभव हुआ?












