बुंदेलखंड में कहते हैं- जैसा करोगे, वैसा भरोगे.. खोटा-खोटा खोट, बात छिपे न छिपती।
सागर में एसपी अनुराग सुजानिया को आए जितना समय हुआ, उतने में अपराधियों पर हुई कार्रवाई अपने आप में रिकॉर्ड है।
सागर में कटरबाजी, चाकूबाजी, अवैध शराब, सट्टा-जुआ पर पुलिस ने कार्रवाई की तो एसपी अनुराग सुजानिया को हटाने की मांग उठ खड़ी हुई। अब सवाल यह है कि मांग जहरीली शराब कांड की जवाबदेही तय करने के लिए उठी है या जिनके अवैध धंधों पर चोट पड़ी, उनकी छाती पर सांप लोट रहा है?
जहरीली शराब कांड कोई हंसी-ठट्ठे की बात नहीं, गंभीर अनर्थ है। जांच ऐसी हो कि दूध का दूध, पानी का पानी हो जाए। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और आबकारी-पुलिस के पूरे तंत्र की जिम्मेदारी तय की जाए। पर भैया, बिना जांचे किसी अफसर को कसूरवार ठहरा देना भी ठीक नहीं, और जांच से पहले उसे पाक-साफ बता देना भी कौन-सा न्याय है?
जब कटरबाजी और चाकूबाजी गलियों में नाच रही थी, तब लोग छाती कूट-कूटकर पूछते रहे.. पुलिस क्या कर रही है?
जब पुलिस ने कार्रवाई की तो वही सुर बदल गया..एसपी को हटाओ!
तो क्या कार्रवाई गलत जगह पर हुई, या कार्रवाई से जिनके अवैध धंधों पर पानी पड़ गया, वे अब हल्ला मचा रहे हैं?
अवैध शराब पर नजर रखने की जिम्मेदारी किसकी थी? सूचना तंत्र कहां विफल हो गया? गांव-मोहल्लों में शराब के अड्डे किसके संरक्षण में पलते रहे? यदि स्थानीय संरक्षण के आरोप हैं तो उनकी तह तक जांच क्यों नहीं पहुंचती? एक हाथ से ताली नहीं बजती, जिम्मेदारी भी अकेले पुलिस के माथे मढ़ देना कौन-सी अक्लमंदी है?
मुरैना के बाद सागर का कांड साफ कहता है कि जहरीली शराब केवल पुलिस की चूक नहीं, पूरे सरकारी तंत्र की नाकामी का आईना है। सरकार को बताना पड़ेगा कि पिछली ठोकर से क्या सीखा और इस बार कौन-सी गांठ फिर ढीली छोड़ दी गई।
घर में चोर बैठा हो और बाहर के चौकीदार को गाली दें, यह कहावत तभी लागू होती है, जब जांच-पड़ताल से पहले ही किसी को दोषी ठहरा दिया जाए।
अगर एसपी की लापरवाही जांच में सामने आती है तो कार्रवाई हो, ऐसी कि आगे कोई अफसर आंख मूंदकर न बैठे। पर अगर कसूर साबित नहीं होता, तो केवल सियासी दबाव या भीड़ के शोर में हटा देना भी न्याय नहीं। और अगर किसी अफसर की कार्रवाई से अपराधियों की कमर टूटती है, तो उनके डर को अफसर की गलती बताने की जिद भी उलटी गंगा बहाने जैसी है।
सागर पुलिस अधीक्षक अनुराग सुजानिया को हटाने की मांग के पीछे ठोस आधार क्या है?
क्या लिखित शिकायत है, जांच रिपोर्ट है या कोई पक्का प्रशासनिक कारण सामने आया है? या फिर आरोपों की गठरी बांधकर दबाव की राजनीति का खेल रचा जा रहा है?
सागर को अपराध से उबारने के लिए पुलिस की सख्ती भी जरूरी है और जहरीली शराब कांड की निष्पक्ष जांच भी। कानून सबके लिए बराबर चले। अफसर हो, शराब कारोबारी हो, संरक्षण देने वाला हो या जिम्मेदार विभाग; किसी की मूंछ कानून से बड़ी नहीं।
बुंदेली में कहते हैं.. बिजूका चिड़ियों को डराता है, चोरों को नहीं। खेत बचता है रखवाली से, पुतला खड़ा कर देने से नहीं।
इसलिए असल सवाल केवल एक अफसर को हटाने का नहीं, उस पूरे तंत्र की जवाबदेही का है, जो अपराध को खाद-पानी देकर पनपाता है






