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करोड़ों की सागौन पर नीति फेल: सिरोंजा काष्ठागार में न विशेष निगरानी, न स्थानांतरण, न जवाबदेही

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 सागर दक्षिण वनमंडल अंतर्गत संभाग का सबसे बड़ा सिरोंजा संभागीय काष्ठागार वनविभाग की कमजोरी और ठोस नीतिगत निर्णयों के अभाव का गंभीर उदाहरण बनता जा रहा है। इस काष्ठागार को कुल लगभग 300 एकड़ क्षेत्र आवंटित है, जिसमें से करीब 100 एकड़ क्षेत्र में बहुमूल्य सागौन लकड़ी सेक्टरवार रखी जाती है। यहीं हजारों घन मीटर सागौन लकड़ी संग्रहित रहती है, जिसकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी जाती है, लेकिन इतनी मूल्यवान संपत्ति पर न तो विशेष निगरानी व्यवस्था है और न ही प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण।

 

100 एकड़ में फैला सागौन का खजाना, लेकिन निगरानी शून्य

काष्ठागार के 100 एकड़ सागौन भंडारण क्षेत्र में नीलामी के लिए 4 से 5 हजार घन मीटर उच्च गुणवत्ता की सागौन रखी जाती है। ग्रेड के अनुसार इसकी कीमत 80 हजार रुपये प्रति घन मीटर तक पहुंचती है। इसके अलावा जंगलों और किसानों से लाई गई सागौन लकड़ी का स्टॉक इससे कई गुना अधिक होता है, जिसे छंटाई के बाद नीलामी प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। इसके बावजूद इस पूरे क्षेत्र के लिए कोई विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल या उच्च स्तरीय निगरानी व्यवस्था लागू नहीं की गई, जो सीधे तौर पर वनविभाग अधिकारियों की उदासीनता को दर्शाता है।

करोड़ों की लकड़ी, लेकिन सुरक्षा केवल औपचारिक

जहां इतनी मूल्यवान सागौन लकड़ी का भंडारण है, वहां सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत कमजोर है। सागौन भंडारण क्षेत्र में की गई तार की फेंसिंग नाममात्र की है, जो कई स्थानों पर कमजोर और क्षतिग्रस्त बताई जाती है। ऐसी व्यवस्था को किसी भी सूरत में पुख्ता सुरक्षा इंतजाम नहीं कहा जा सकता। न तो मजबूत बाउंड्रीवाल है, न इलेक्ट्रॉनिक फेंसिंग, और न ही प्रशासन और वनविभाग द्वारा वर्षों से लंबित सुरक्षा सुधारों पर कोई ठोस निर्णय लिया गया।

 

CCTV शून्य, डिजिटल निगरानी पर अब तक कोई निर्णय नहीं

इतने बड़े और संवेदनशील काष्ठागार परिसर में एक भी सीसीटीवी कैमरा नहीं है, नाइट विजन निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं और न ही कोई डिजिटल स्टॉक मॉनिटरिंग सिस्टम मौजूद है। सुरक्षा के लिए सीमित संख्या में कर्मचारी तैनात हैं। शिफ्ट व्यवस्था के बाद वास्तविक रूप से 4–5 कर्मचारी ही निगरानी में रहते हैं, जो 100 एकड़ सागौन भंडारण क्षेत्र के लिए बेहद अपर्याप्त हैं। इसके बावजूद वनविभाग के उच्च अधिकारियों की ओर से आज तक डिजिटल निगरानी लागू करने का कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारी, स्थानांतरण नीति निष्क्रिय

सबसे गंभीर प्रशासनिक सवाल उन अधिकारियों और कर्मचारियों को लेकर है, जो दशकों से एक ही काष्ठागार में पदस्थ हैं। इतने संवेदनशील और उच्च मूल्य वाले परिसर में नियमित स्थानांतरण नीति लागू होनी चाहिए थी, लेकिन सिरोंजा काष्ठागार में यह नीति वर्षों से निष्क्रिय नजर आती है।

लंबे समय से जमे प्रमुख नाम..

लाखन राजगौड़ – सिपाही से वनपाल और फिर डिप्टी रेंजर बने। कुछ समय  को छोड़कर पूरी सेवा सिरोंजा काष्ठागार में ही रही।

प्रदीप शास्त्री – 1988 में नियुक्ति, कुछ माह को छोड़ दे बाकी पूरी सेवा इसी काष्ठागार में।

मनोज शर्मा – 1988 के आसपास की नियुक्ति, केवल कुछ माह नौरादेही गए, शेष समय सिरोंजा में ही पदस्थ।

दसरथ लोधी – 1988 के आसपास से अब तक की लगभग पूरी नौकरी इसी काष्ठागार में।

दीपक यादव – सिपाही से वनपाल बने, 10 वर्षों से के समय से लगभग यहीं पदस्थ।

प्रशांत जैन – कुछ समय सहजपुर (देवरी) में रहे, लेकिन 2012–13 के बाद से सिरोंजा काष्ठागार में ही जमा हुआ है।

सागौन चोरी की घटनाएं, लेकिन रिकॉर्ड व्यवस्था कमजोर

सूत्रों के अनुसार, सिरोंजा काष्ठागार में सागौन लकड़ी चोरी की घटनाएं हो चुकी हैं। इसके बावजूद वनविभाग यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि चोरी में कितने नग गए, किस ग्रेड की लकड़ी चोरी हुई और वास्तविक नुकसान कितना हुआ। रिकॉर्ड की यह कमजोरी प्रशासनिक नियंत्रण पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

 

व्यापारियों को दी जाने वाली मात्रा और ग्रेडिंग पर निगरानी नहीं

नीलामी के बाद जब व्यापारी अपनी खरीदी गई सागौन लकड़ी लेने आते हैं, तो उन्हें दी जाने वाली तय मात्रा और ग्रेड को लेकर भी संदेह बना रहता है।

सागौन लकड़ी की ग्रेडिंग थर्ड-ए, थर्ड-बी, फोर-ए, फोर-बी में कीमतों का अंतर कई गुना होता है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया पर स्वतंत्र या तकनीकी निगरानी व्यवस्था नहीं है।

 

ठोस कदम न उठाए जाने से बढ़ता जोखिम..

डिजिटल निगरानी, नियमित ऑडिट, स्वतंत्र सत्यापन और प्रभावी स्थानांतरण नीति जैसे बुनियादी सुधारों की आवश्यकता वर्षों से महसूस की जा रही है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर आज तक ठोस निर्णय नहीं लिए गए। इसका सीधा परिणाम यह है कि करोड़ों की सागौन लकड़ी आज भी कमजोर व्यवस्थाओं के भरोसे सुरक्षित मानी जा रही है।

 

निष्कर्ष: प्रशासनिक जवाबदेही तय किए बिना सुधार संभव नहीं

100 एकड़ में फैला सागौन भंडारण, नाममात्र की सुरक्षा, CCTV शून्य निगरानी, चोरी की घटनाओं का अस्पष्ट रिकॉर्ड और वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारी ये सभी तथ्य प्रशासनिक कमजोरी और नीतिगत विफलता की ओर साफ इशारा करते हैं।

जब तक विशेष निगरानी व्यवस्था लागू नहीं होती, स्थानांतरण नीति पर सख्ती से अमल नहीं होता और सुरक्षा को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक सिरोंजा संभागीय काष्ठागार पर उठते सवाल खत्म नहीं होंगे।