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ज्योति के फेंके पांसे गोपाल के इशारे पर नाचे, जीवन नाम पर शक की सुई कमलेश बने रहे मिस्टर इंडिया, कांग्रेस के ढोल नगाड़ों मे रहली विस बीजेपी की लगी थाप

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ज्योति के फेंके पांसे गोपाल के इशारे पर नाचे, जीवन नाम पर शक की सुई कमलेश बने रहे मिस्टर इंडिया, कांग्रेस के ढोल नगाड़ों मे रहली विस बीजेपी की लगी थाप

मध्यप्रदेश की राजनीति में रहली विधानसभा ऐसा नाम है जिसे आज हर कोई समझना चाहता है। पिछले 8 विधानसभा से भारतीय जनता पार्टी और पंडित गोपाल भार्गव के लिए यह सीट सुरक्षित बनी हुई हैं।

कांग्रेस पार्टी इस विधानसभा में उम्मीदवार और संगठन स्तर पर तमाम प्रयोग कर चुकी है। भार्गव कहते हैं मेरे खिलाफ कांग्रेस अभी तक कोई दमदार प्रत्याशी नही उतार पाई है। हम इस पर गौर करें तो ज्यादातर उम्मीदवार भार्गव को हराने के लिए बिछाई राजनीतिक बिसात में खुद फंसकर रह जाते हैं। विपक्ष के लिए भार्गव की लोकप्रियता बड़ी चुनौती रहती है। उन्हें घेरने के मुद्दों पर अधिकतर में प्रमाणिकता साबित नही हो पाती है।

भार्गव सामने वाले प्रत्याशी को खुला मैदान देते हैं। प्रतिद्वंद्वी न होकर वो दर्शक की भूमिका में नजर आते हैं। लड़ने की थाप और ललकार को खामोशी से सुनते हैं। पहले मौका देने वाले गोपाल जब पलटवार करते हैं विपक्षी खेमा उसका सही जबाब नही दे पाता है। 2018 विस में खिलाफ में उतरे कमलेश साहू को कांग्रेस पार्टी द्वारा टिकिट देने के मकसद में लंबे समय तक उनसे जुड़ा हुआ रहना रहा था। संगठन को विश्वास था कि उन्हें साहू के रूप में भार्गव का काट मिल जाएगा। भार्गव से जुड़े रहकर खिलाफ में चुनाव लड़ने का कुछ हद तक लाभ भी मिलता है। 50 हजार तय जीत का लक्ष्य 27 हजार मतों तक पहुंच जाता है।

अभी तक के परिणामों पर नजर डालें तो बीजेपी के जीत के पैमानों पर क्षेत्र में भार्गव की लगातार सक्रियता सामने आई है। अभिषेक भार्गव की क्षेत्र में नजर और निदान के साथ सोशल मीडिया पर पकड़ काबिले तारीफ है। उनकी एक बड़ी फ्रेंड फॉलोइंग है। साथ ही विस रहली के बीजेपी संगठन के अधिकारी व कार्यकर्ताओं की दम पर क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को खोजने में बड़ी मदद रहती है। 2018 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार इससे पहले साथ रहकर भी इसे पूरी तरह समझ नही पाए। इस लंबी चैन को बना पाना साहू के लिए नामुमकिन जैसा था। 2023 के चुनाव में आशा के विपरीत 2018 जैसी पुनरावृत्ति हुई है। इसके साथ कांग्रेस प्रत्याशी ज्योति पटेल सहित उनके समर्थक खुद के बयानों में उलझते गए। कमलनाथ की सभा जैसे ज्योति के समर्थन में न होकर भार्गव के पक्ष में चली गई।

ज्योति पटेल और जीवन पटेल की लड़ाई किसी से छुपी हुई नही है। जीवन का भार्गव को ट्रेक्टर से कुचलने वाला बयान ज्योति पटेल को पहले से परेशान कर रहा था। पिता और पुत्र ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया। बाकी कसर उस सभा में पूरी हो गई जहां पटेल और आनंद मंच पर भाषण दे रहे कमलनाथ के सामने उलझ जाते हैं। दोनों एक दूसरे पर हाथ छोड़ते दिखाई देते हैं। इस विवाद के बाद जीवन की सक्रियता कम दिखाई देने लगती है। साथ दे रहे कमलेश साहू जो अंदर और बाहर से संगठन को मजबूती दे रहे थे वो चुनावी रण की मात्र औपचारिकता करते दिखाई देने लगते हैं। मिंटू चौरहा परिवार सहित जरूर साथ नजर आते रहे। हालांकि लोकप्रियता और जातिगत गणित में वो ज्योति पटेल की वोट बैंक में ज्यादा खास इजाफा नही कर पाए, क्योंकि क्षत्रियों का बड़ा वर्ग गोपाल भार्गव का खुला समर्थन करता रहा है।

हम रहली विस 2023 के चुनाव को समझें तो ज्योति के हिसाब से हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते चले गए। कांग्रेस की उथल- पुथल के बाद यहां का चुनाव परिणाम हफ्ते भर पहले समझ आने लग गया था। संगठन और ज्योति खेमा द्वारा बिछाई बिसात में वो खुद उलझते चले गए। हमेशा की तरह यह चुनाव बीजेपी के लिए ज्यादा चुनौती भरा नही रहा है। एक कुशल और अच्छे राजनेता के तौर पर पंडित गोपाल भार्गव ने इस बार फिर अपने आपको साबित किया है।

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