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सागर में मौत की मशीनें बनीं पैथोलॉजी लैब्स.. गलत रिपोर्ट, गलत इलाज और साइन माफिया का वो खूनी खेल जिसे प्रशासन देखना नहीं चाहता

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अगर आप सागर जिले के किसी निजी पैथोलॉजी लैब में अपना खून जांच के लिए दे रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। इस बात की पूरी आशंका है कि आपकी रिपोर्ट कोई योग्य डॉक्टर नहीं, बल्कि एक कम पढ़ा-लिखा कंप्यूटर ऑपरेटर तैयार कर रहा है। सागर और इसके आस-पास के कस्बों (बंडा, खुरई, देवरी, राहतगढ़) में स्वास्थ्य सेवा के नाम पर सफेदपोश कत्लगाहों का एक ऐसा जाल बिछ चुका है, जो सीधे तौर पर मरीजों की जिंदगी का सौदा कर रहा है। हमारी पड़ताल में सामने आया है कि यह खेल सिर्फ पैसों की ठगी का नहीं, बल्कि गलत रिपोर्ट के जरिए मरीजों को धीरे-धीरे मौत के मुंह में धकेलने का एक बड़ा क्रिमिनल नेटवर्क है।

कैसे काम करता है यह घातक चक्रव्यूह?
शहर के कई नामी और गैर-नामी डॉक्टर इन लैब्स से 30% से 50% तक का फिक्स कमीशन लेते हैं। मरीज को जानबूझकर उसी लैब में भेजा जाता है जहाँ से कट मिलता है।
जिस एमडी पैथोलॉजिस्ट डॉक्टर के नाम का बोर्ड बाहर लगा है, वह असल में 200 किलोमीटर दूर भोपाल या इंदौर में सो रहा होता है। उसकी डिग्री सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की कागजी फाइलों को पेट भरने के लिए किराए पर ली गई है।
लैब का आधा-अधूरा सीखा टेक्नीशियन मशीनों से निकले आंकड़ों से छेड़छाड़ करता है। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में डॉक्टर का डिजिटल सिग्नेचर पहले से फीड रहता है। बटन दबाते ही बिना डॉक्टर की नजर पड़े फाइनल रिपोर्ट प्रिंट हो जाती है।

सागर के ग्रामीण इलाकों और तिल्ली-मकरोनिया की कई लैब्स में हल्की सर्दी-खांसी वाले मरीज को भी विडाल टेस्ट और प्लेटलेट्स की फर्जी रिपोर्ट देकर टाइफाइड या गंभीर डेंगू का मरीज घोषित कर दिया जाता है। मरीज दहशत में आकर महंगे अस्पतालों में भर्ती होता है।
प्लेटलेट्स का फर्जीवाड़ा..
जैसा कि बंडा के पिछले मामलों में देखा गया, एक स्वस्थ इंसान की प्लेटलेट्स रिपोर्ट में 20,000 बता दी जाती है (जबकि असल में वह 2 लाख होती है)। इस गलत रिपोर्ट को देखकर डॉक्टर मरीज पर भारी-भरकम एंटीबायोटिक और स्टेरॉयड का लोड डाल देते हैं।

गलत इलाज का जानलेवा परिणाम..
जब एक स्वस्थ शरीर में बिना जरूरत के हाई-डोज स्टेरॉयड, एंटीबायोटिक और ड्रिप चढ़ाई जाती है, तो मरीज के लिवर और किडनी हमेशा के लिए डैमेज हो जाते हैं। कई बार गलत रिपोर्ट के आधार पर दी गई दवाओं के कारण मरीज मल्टी-ऑर्गन फेलियर का शिकार हो जाता है। यानी बीमारी से नहीं, पैथोलॉजी की ‘गलत रिपोर्ट’ और डॉक्टर के गलत इलाज से मरीज दम तोड़ देता है।

सवाल यह उठता है कि सागर का मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय और स्वास्थ्य विभाग का अमला क्या सिर्फ दफ्तरों में बैठकर फाइलों पर दस्तखत करने के लिए है? समय-समय पर दिखावे के लिए दो-चार लैब्स को सील किया जाता है। लेकिन इसके पीछे का जो मुख्य सिंडिकेट है जिसमें कमीशनखोर डॉक्टर, फर्जी लैब संचालक और डिजिटल सिग्नेचर बेचने वाले पैथोलॉजिस्ट शामिल हैं उन पर कभी गैंगस्टर एक्ट या गैर-इरादतन हत्या (धारा 105 BNS) का मुकदमा क्यों नहीं दर्ज होता?

जब तक इन फर्जी लैब संचालकों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा और उनकी डिग्री जब्त नहीं होगी, तब तक सागर के मासूम और गरीब मरीज इसी तरह इस हेल्थ माफिया के शिकार होते रहेंगे।