दहशत का दूसरा नाम कटरबाज़: सागर में खुलेआम वसूली और वार

सागर शहर में इन दिनों अगर दहशत का कोई पर्याय बन चुका है, तो वह है- कटरबाज़ों की गैंग। शहर में बढ़ती आपराधिक घटनाओं के पीछे इनका नाम बार-बार सामने आ रहा है। आम लोगों से लेकर रसूखदारों तक, इनके हौसले इस कदर बुलंद हैं कि ये रास्ता रोककर खुलेआम पैसों की मांग करने से भी नहीं हिचकते।

 

कुछ समय पहले इन कटरबाज़ों ने एक ऐसे व्यक्ति को रोक लिया, जिसका नाम शहर में सम्मान से कम और भय के रूप में ज़्यादा लिया जाता है। शायद उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि जिनसे पुलिस तक सतर्क रहती है, उन्हें रौब बताना कितना भारी पड़ सकता है। जैसे ही सामने वाले ने अपना नाम बताया, अगले ही क्षण उस पर आठ-दस कटरों से ताबड़तोड़ वार कर दिए गए।

यह बताने की ज़रूरत नहीं रह जाती कि वे कौन लोग हैं और उनके हौसले इतने बुलंद क्यों हैं। 

 

हैरानी की बात यह है कि जब ये नशे में नहीं होते, तो इन्हें जानने वाले बताते हैं कि इनकी शालीनता देखने लायक होती है। गर्दन झुकाए, चुपचाप मोहल्लों की गलियों से निकल जाते हैं। रास्ते में कोई परिचित मिल जाए तो जय राम जी ,नमस्ते चाचा, भैया जैसे शब्दों से सम्मान भी जताते हैं। लेकिन यही लोग नशे की हालत में इतने हिंसक हो जाते हैं कि मारपीट, गंभीर चोटें पहुंचाना, यहां तक कि हत्या जैसी बड़ी वारदातों को भी अंजाम दे डालते हैं।

 

सबसे बड़ा सवाल प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर है। नशे की दवाइयां बेचने वालों पर कभी-कभार कार्रवाई तो होती है, लेकिन उस पर सतत और प्रभावी निगरानी नहीं दिखाई देती। संबंधित थानों की पुलिस इन कटरबाज़ों में से अधिकांश को जानती है। यदि इन्हीं पर नियमित निगरानी रखी जाए, उनकी गतिविधियों पर नज़र हो, तो ऐसी घटनाओं पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।

 

आज जरूरत कार्रवाई की नहीं, लगातार निगरानी और सख़्त नियंत्रण की है। वरना सागर में दहशत का यह साया और गहराता ही जाएगा।

 

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